ओस की नमी और तुम्हारा स्पर्श
ओस की नमी
जब पत्तों पर उतरती है,
सब कुछ हल्का-सा भीग जाता है
बिना बारिश,
बिना शोर।
वैसा ही है
तुम्हारा स्पर्श
नज़र नहीं आता,
पर रूह तक
नरमी छोड़ जाता है।
मैंने कई बार
उस नमी को छूकर
तुम्हें महसूस किया है,
जैसे तुम
बिना आए भी
पास हो।
वो ठंडक,
वो हल्की-सी सिहरन
कुछ कहती तो है,
पर शब्द नहीं ढूँढ पाती।
और फिर
सूरज चढ़ता है,
ओस खो जाती है,
पर तुम्हारा स्पर्श
कहीं भीतर
रह जाता है।
ओस की नमी
और तुम्हारा स्पर्श
दोनों ही
छूकर भी
अनछुए रह जाते हैं
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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