चंद्रमा की बेचैनी में लोग
रात जैसे ही उतरती है,
शहर की साँस बदल जाती है
दिन की ठोस आवाज़ें
धीरे-धीरे पिघलकर
एक तरल खामोशी में बहने लगती हैं।
मैं छत पर खड़ा होकर
आकाश को देखता हूँ,
चाँद आज पूरा नहीं है
थोड़ा कटा हुआ,
थोड़ा हिचकता हुआ,
जैसे अपनी ही रोशनी से
पूरी तरह आश्वस्त न हो।
नीचे लोग
अपने-अपने कमरों में बंद,
पर नींद
किसी के पास पूरी नहीं है
किसी की आँखों में
पुरानी यादें जागती हैं,
किसी के भीतर
अधूरे वाक्य घूमते रहते हैं।
एक आदमी
खिड़की के पास बैठा है,
बार-बार फोन उठाता है,
फिर रख देता है
जैसे शब्द
उसके गले में अटक गए हों।
एक औरत
रसोई में बिना वजह
कुछ ढूँढ़ रही है,
उसे खुद नहीं पता
क्या खो गया है
पर उसकी उँगलियाँ
किसी खालीपन को टटोल रही हैं।
बच्चे भी
आज जल्दी नहीं सोते,
उनकी आँखों में
एक अजीब-सी चमक है
जैसे सपनों ने
अभी तक उन्हें
अपना रास्ता नहीं दिखाया।
मैं सोचता हूँ,
क्या चंद्रमा सचमुच
हमारे भीतर उतर आता है?
या हम ही
अपनी बेचैनियों को
उसके चेहरे पर पढ़ लेते हैं?
क्योंकि आज
हर दिल में
एक हल्की-सी लहर है
बिना कारण उठती हुई,
बिना किनारे टकराए
वापस लौटती हुई।
रात गहराती है,
और चाँद
थोड़ा और फीका पड़ जाता है
जैसे उसने
हमारी सारी बेचैनियाँ
अपने भीतर खींच ली हों।
और हम
लोग,
जो दिन में इतने निश्चित दिखते हैं,
रात में
उतने ही अस्थिर हो जाते हैं
चंद्रमा की इस अधूरी रोशनी में
अपने ही भीतर
एक अनकहा सवाल बनकर रह जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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