मनुष्य कभी-कभी पुराने रेडियो जैसा हो जाता है

 मनुष्य कभी-कभी

पुराने रेडियो जैसा हो जाता है 

ऊपर से बिल्कुल ठीक,

मगर भीतर कोई तार ढीला पड़ चुका होता है।


फिर अचानक

किसी मामूली-सी आवाज़ पर

पूरा अतीत खड़खड़ाने लगता है।


मैंने लोगों को

अपने दुख छिपाते नहीं देखा,

वे उन्हें

जेब में रखी चाबियों की तरह साथ लिए घूमते हैं।

चलते हैं तो

हल्की-हल्की आवाज़ आती रहती है।


कुछ रिश्ते

सर्दियों की धूप जैसे होते हैं।

वे आपको बदलते नहीं,

बस थोड़ी देर

जमे हुए हिस्सों पर बैठे रहते हैं।


और कुछ लोग —

वे जीवन में ऐसे दाख़िल होते हैं

जैसे सफ़ेद शर्ट पर

स्याही की पहली बूँद।

बहुत छोटी,

मगर फिर कभी पूरी तरह मिटती नहीं।


अब मुझे लगता है

याददाश्त

किसी ईमानदार लाइब्रेरियन की तरह नहीं होती।

वह शराबी दुकानदार जैसी होती है 

ज़रूरी चीज़ें गुम कर देती है,

और बेकार चीज़ें

बरसों सँभालकर रखती रहती है।


जैसे अचानक याद आ जाएगा

बीस साल पहले

किसी ने चाय रखते वक़्त क्या कहा था,

मगर यह याद नहीं आएगा

कि आख़िरी बार

दिल से हँसे कब थे।


समय भी

घड़ी की सुइयों से नहीं चलता शायद।

वह चलता है

उन चीज़ों से

जिन्हें हम धीरे-धीरे इस्तेमाल करना छोड़ देते हैं।


पुराना कैमरा,

किसी का नाम लेकर पुकारना,

हाथ से ख़त लिखना,

या बिना वजह

किसी के घर चले जाना।


एक दिन पता चलता है

ज़िंदगी ख़त्म नहीं हुई,

बस उसकी कई आदतें

चुपचाप मर गईं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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