पहले तो मेरी रूह में ख़ुद शामिल हुआ

पहले तो मेरी रूह में ख़ुद शामिल हुआ
फिर वो ख़ुद-ब -ख़ुद मुझसे हुआ जुदा
पहले पत्थर था शिद्दत से तराशा जिसे
मगरूर हो मुझी को कहता है मेरा ख़ुदा
जिसके साँस साँस को था दिल से सुना
उसी ने मेरी पुकार को किया अनसुना
टूट जाने का मुझको कोई ख़ौफ़ न था
कोई मगरूर न समझे इसी लिए झुका
रौशनी की कोई उम्मीद न कर मुकेश
मुद्दतों से हूँ एक चराग़ अब बुझा हुआ
मुकेश इलाहाबादी -------

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