लफ़्ज़ों की बँसूली से ख़ुद को छील रहा हूँ
लफ़्ज़ों की बँसूली से ख़ुद को छील रहा हूँ
नज़्म नहीं लिख रहा दरअसल चीख रहा हूँ
मेरा घर छोड़ सारे शहर में बारिश-बारिश
ऐ सितमगर देख फिर भी मै भीग रहा हूँ
मुझे न संवार पाओगे बिखरा ही रहने दे
वैसे भी तो तमाम उम्र बेतरतीब रहा हूँ
मुझ जैसे औघड़ को कौन पास बैठता
लिहाज़ा खुद ही ख़ुद के नज़दीक रहा हूँ
ज़माना समझता है मुकेश बदल गया है
मै भी नए ज़माने का चलन सीख रहा हूँ
मुकेश इलाहाबादी ------------------------
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