एक ही नदी साझा हो के बह रही थी
एक
ही नदी
साझा हो के
बह रही थी
हमारे दरम्याँ
जिसे
हम दोनों ने
उलीचा एक दूसरे पे
खुश हुए
उछलती हुई
लहरों को देख
फिर हम बहुत देर उलीचते रहे
एक दुसरे के सुख को / दुःख को
और
भीगते - भिगोते रहे
एक दूजे को
बहुत देर तक
मुकेश इलाहाबादी -----
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