देखना इक दरिया बहेगा अब

 देखना इक दरिया बहेगा अब

जमा हुआ दर्द पिघलेगा अब
सूरज ने मुझको सोख लिया
दर्द आसमाँ से बरसेगा अब
जिसने मेरा फ़साना न सुना
मेरी खामोशियाँ सुनेगा अब
मै खश्बू बन गया उसके लिए
मुझे साँसो में मह्सूसेगा अब
दिन के उजाले में देखा नहीं
स्याह रातों में मुझे ढूंढेगा अब
मुकेश इलाहाबादी ------

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