नोक–झोंक : थोड़ी-सी तुम, थोड़ा-सा मैं
उसने पूछा -
तुम हर बात में आख़िरी शब्द क्यों बोलते हो?
मैंने कहा—
ताकि तुम्हें बीच में टोकने का मौका मिले।
वो आँखें तरेरकर बोली—
बहुत चालाक हो तुम।
मैंने मुस्कुराकर कहा—
नहीं, बस तुम्हें मुस्कुराते देखने की आदत है।
— तुम्हें हर वक़्त मज़ाक क्यों सूझता है?
सीरियस नहीं हो सकते कभी?
— जब तुम सामने होती हो
तो दुनिया इतनी भारी नहीं लगती,
फिर सीरियस क्यों रहूँ?
वो चुप हुई,
फिर बोली—
और जब मैं सामने न रहूँ?
मैंने धीरे से कहा—
तब तुम्हारी याद
मुझे सीरियस बना देती है।
— ड्रामा मत करो।
— सीखा तुमसे ही है।
वो हँस पड़ी—
अच्छा ये बताओ,
हर बात टाल क्यों देते हो?
— क्योंकि तुम हर बात पकड़ लेती हो।
— और अगर मैं पकड़ना छोड़ दूँ?
— तो शायद मैं गिर जाऊँ।
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर उसने मेरी चाल पर तंज़ किया—
इतना धीरे क्यों चलते हो?
— ताकि तुम आगे निकलकर
फिर पीछे मुड़कर देखो।
— तुम्हें यक़ीन है मैं मुड़कर देखती हूँ?
मैंने कहा—
अगर न देखती होती
तो पूछती क्यों इतनी बातें?
वो हल्का-सा शरमा गई—
-बहुत जानते हो अपने बारे में।
— नहीं,
बस तुम्हारी आँखों में
अपना अक्स पढ़ लेता हूँ।
वो अचानक गंभीर हुई—
अगर एक दिन
मैंने सवाल पूछना बंद कर दिया तो?
— तो समझ जाऊँगा
कि हमारी नोक–झोंक
ख़ामोशी में बदल गई है।
— और तुम्हें फर्क पड़ेगा?
मैंने हँसकरकहा —
इतना कि
रास्ता भी पूछेगा
आज बातें कम क्यों हैं?
वो मुस्कुराई—
तुम्हें पता है,
तुम झगड़ते बहुत प्यारे हो।
मैंने कहा—
और तुम उलझती बहुत ख़ूबसूरत हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
बहुत सुंदर
ReplyDeleteaabhar - post like karne aur comment karne ke liye
Deletethnx post pasand karne aur comment karne ke liye
Deleteवाह
ReplyDeleteअहा!!!
ReplyDeleteलाजवाब👌👌👌
सुंदर
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