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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 12 : शाम, चाय और गुमटी वाला

 लघु उपन्यास

भाग – 12  : शाम, चाय और गुमटी वाला


वाशिंग मशीन

अब भी घूम रही थी।


उसकी मोटर की आवाज़

कमरे में एक अजीब-सी लय बना रही थी—


घुर्र… घुर्र… घुर्र…


जैसे कोई बूढ़ा तबला-नवाज़

धीमे-धीमे रियाज़ कर रहा हो।


मैं खिड़की के पास खड़ा था।


सिगरेट का धुआँ

धीरे-धीरे ऊपर उठता

फिर बाहर की हवा में घुल जाता।


नीचे सड़क पर

शाम उतरने लगी थी।


सूरज

अब दीवारों के पीछे

धीरे-धीरे सरक रहा था।


आसमान में

हल्की पीली रोशनी बची थी—

जैसे दिन ने

अपना आख़िरी ख़त लिखकर

लिफ़ाफ़ा बंद कर दिया हो।


मैंने सोचा—


चलो

चाय पी आते हैं।


कमरे का दरवाज़ा बंद किया।


सीढ़ियाँ उतरते हुए

मकान-मालिक के कमरे के पास से गुज़रा।


दरवाज़ा आधा खुला था।


अंदर

रेडियो बहुत धीमी आवाज़ में बज रहा था।


वह कुर्सी पर बैठे

खिड़की से बाहर देख रहे थे।


उनकी आँखों में

अब हिसाब-किताब नहीं था—

सिर्फ़

एक लंबी चुप्पी थी।


मैंने हल्के से कहा—

“नमस्ते।”


उन्होंने सिर हिलाया—


“चाय पीने जा रहे हो?”


मैं मुस्कुरा दिया—


“जी।”


उन्होंने कहा—


“मेरे लिए भी

एक कुल्हड़ ले आना।”


मैंने सिर हिलाया

और बाहर निकल आया।


गली के मोड़ पर

वही छोटी-सी गुमटी थी।


टीन की छत

और सामने लकड़ी का काउंटर।


उस पर

एल्यूमीनियम की केतली

लगातार उबल रही थी।


चाय वाला

गिलासों में चाय उड़ेलते हुए

किसी पुराने गाने की धुन

गुनगुना रहा था।


मैं पास पहुँचा।


वह मुझे देखते ही बोला—


“आओ भाई साहब…

आज देर से आए।”


मैंने कहा—


“आज घर में

कपड़ों की पंचायत लगी थी।”


वह हँस पड़ा—


“फिर फैसला क्या हुआ?”


मैंने कहा—


“सबको

वाशिंग मशीन की जेल में डाल दिया।”


वह और ज़ोर से हँस पड़ा।


फिर दो कुल्हड़

चाय से भर दिए।


एक मुझे दिया।

एक मैंने अलग रखवा लिया—

मकान-मालिक के लिए।


मैं गुमटी के पास खड़ा

धीरे-धीरे चाय पीने लगा।


शाम अब

पूरी तरह उतर आई थी।


सड़क पर

लाइटें जल चुकी थीं।


लोग

अपने-अपने घरों की तरफ़ लौट रहे थे।


चाय की भाप

ठंडी हवा में मिलकर

छोटे-छोटे बादल बना रही थी।


मैंने अचानक सोचा—


दिन भर

कमरे की चीज़ें मुझसे बातें करती हैं।


चादर…

जींस…

कमीज़…

वाशिंग मशीन…


और अब

यह चाय का कुल्हड़ भी

मेरे हाथों में

धीरे-धीरे गर्म होकर

कुछ कह रहा है।


शायद

जिंदगी भी ऐसी ही है—


हर चीज़

धीरे-धीरे

अपनी भाषा में

हमसे बात करती रहती है।


बस

हम अक्सर सुन नहीं पाते।


मैंने चाय का आख़िरी घूंट लिया।


दूसरा कुल्हड़ उठाया

और गली की तरफ़ चल पड़ा।


कमरे की ओर लौटते हुए

मुझे लगा—


आज रात

शायद


मेरे कमरे की कोई नई चीज़

मुझसे

एक नई कहानी कहेगी।


— मुकेश

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