लघु उपन्यास
भाग – 12 : सिगरेट की दुकान वाला
शाम की चाय पीकर
जब मैं गुमटी से लौटा,
तो अचानक याद आया
सिगरेट की डिब्बी
अब लगभग खाली है।
कमरे में
अधूरी सिगरेट का होना
वैसा ही है
जैसे किसी वाक्य में
अचानक शब्द खत्म हो जाएँ।
मैं फिर से
सीढ़ियाँ उतर आया।
गली के मोड़ पर
वही छोटी-सी दुकान है
टीन की छत,
लकड़ी का काउंटर,
और ऊपर टँगा हुआ
फीका पड़ चुका बोर्ड।
दुकान वाला
मुझे देखते ही मुस्कुरा दिया।
“आइए भाई साहब,
आज फिर धुआँ खरीदने आए हैं?”
मैं हँस दिया।
“हाँ,
थोड़ा धुआँ
और थोड़ा सुकून।”
उसने डिब्बी उठाई
और काउंटर पर रख दी।
फिर अचानक बोला
“आप जानते हैं,
मेरी दुकान पर
सबसे ज़्यादा क्या बिकता है?”
मैंने कहा—
“सिगरेट।”
वह सिर हिलाकर बोला
“नहीं…
यहाँ सबसे ज़्यादा
थकान बिकती है।”
मैंने हैरानी से पूछा
“थकान?”
वह बोला—
“हाँ।
कोई नौकरी से थककर आता है,
कोई घर से,
कोई अपने रिश्तों से।
सिगरेट तो
बस बहाना है।”
उसकी बात सुनकर
मैं कुछ पल चुप रहा।
उसने माचिस बढ़ाते हुए कहा
“आप भी
कभी-कभी बहुत सोचते लगते हैं।”
मैंने सिगरेट जलाई।
धुआँ
धीरे-धीरे
आसमान में उठने लगा।
मैंने पूछा—
“तुम्हें कैसे पता?”
वह हँस दिया।
“दुकान पर बैठकर
लोगों के चेहरे पढ़ना
सीख जाता है आदमी।”
फिर उसने कहा
“कुछ लोग
दिन में एक सिगरेट पीते हैं,
कुछ दस।
पर जो लोग
चुपचाप धुआँ देखते रहते हैं
वे ज़्यादा सोचते हैं।”
मैंने
सिगरेट का एक लंबा कश लिया।
गली में
धीरे-धीरे अँधेरा उतर रहा था।
दुकान की पीली बल्ब की रोशनी
धुएँ में घुल रही थी।
मैंने पैसे दिए।
वह बोला
“रहने दीजिए,
कल दे देना।”
मैंने कहा—
“क्यों?”
वह मुस्कुरा कर बोला
“उधार भी
रिश्तों की तरह होता है।
थोड़ा-सा रहे
तो अच्छा लगता है।”
मैं चुप रह गया।
सिगरेट की डिब्बी
जेब में रखी
और गली की तरफ़ चल पड़ा।
ऊपर कमरे की खिड़की
अँधेरे में दिख रही थी।
मुझे लगा
कमरे में रखी
वाशिंग मशीन
अब शायद रुक चुकी होगी।
कपड़े
शायद
भीतर से हल्के हो गए होंगे।
और शायद
कमरा भी
मेरे लौटने का
इंतज़ार कर रहा होगा।
मैं सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
और सोचने लगा—
कितनी अजीब बात है—
दिन भर
मैं जिन चीज़ों से भागता हूँ,
शाम को
वही चीज़ें
मुझसे
सबसे ज़्यादा
बातें करती हैं।
— मुकेश
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