तुम और और सारंगी
1 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, और मैं उसी की थरथराती हुई चुप्पी।
2 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, इसलिए मेरी ख़ामोशी भी संगीत बन जाती है।
3 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, और मैं अपने ही भीतर बैठा श्रोता हूँ।
4 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, इसलिए मेरा अकेलापन भी राग हो गया है।
5 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, और मेरी आत्मा तुम्हारी तान में धीरे-धीरे खुलती है।
6 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, इसीलिए मेरी हर सांस एक अनसुना आलाप है।
7 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, और मैं अपने ही भीतर का सूफ़ी दरवेश।
8 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, इसलिए मेरी चुप्पी भी एक पूरा राग छुपाए बैठी है।
9 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, और मेरा अस्तित्व सिर्फ़ तुम्हारी गूँज है।
10 तुम मेरे अंदर बजती सारंगी हो, इसीलिए मुझे बाहर कोई संगीत नहीं चाहिए।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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