“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
बीच में
कितनी ही ऋतुएँ बीत जाएँ,
पत्ते झरें
और नए उग आएँ।
पर एक दिन
किसी शाम
मैं तुम्हारे सामने खड़ा होऊँगा।
तुम
पहचान लेना।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment