मॉल में घूमता हुआ खाली जेब वाला आदमी
जब तक
किसी मॉल की चमकती हुई रोशनी में
एक आदमी
खाली जेब लेकर
धीरे-धीरे चलता हुआ
ज़िंदा है
तब तक
चमक पूरी सच्चाई नहीं है दोस्तों!
वह आदमी
जिसके कदम
एस्केलेटर पर भी
संकोच से चढ़ते हैं,
जिसकी आँखें
हर दुकान के शीशे में
थोड़ी देर ठहर जाती हैं
जैसे
देख रहा हो
एक ऐसी दुनिया
जो उसकी है भी
और नहीं भी।
ब्रांडेड कपड़ों के बीच
वह अपने पुराने शर्ट को
हल्का-सा ठीक करता है
जैसे
अपनी इज़्ज़त को
क्रीज़ दे रहा हो।
हर दुकान में
"SALE" लिखा है
पर
उसके लिए
हर चीज़ अब भी
"OUT OF REACH" है।
वह रुकता है
एक जूते की दुकान के सामने,
कीमत देखता है,
और
हल्का-सा मुस्कुरा देता है
जैसे
अपने ही ख़्वाब से
मज़ाक कर लिया हो।
फूड कोर्ट में
भीड़ है
हँसी है,
ट्रे हैं,
कॉफी है
वह
एक कोने में खड़ा होकर
मेन्यू बोर्ड पढ़ता है,
फिर
पानी पीकर
तसल्ली कर लेता है।
बच्चों को देखता है
आइसक्रीम खाते हुए,
खिलौनों पर झगड़ते हुए
उसकी आँखों में
एक पुराना रविवार
हल्का-सा जाग जाता है।
मोबाइल निकालता है
किसी को कॉल नहीं करता
बस
स्क्रीन देखता है,
जैसे
खुद से बच रहा हो।
सिक्योरिटी गार्ड
एक नज़र देखता है उसे
वह
थोड़ा सीधा हो जाता है
जैसे
अपनी गरीबी को
जेब में छुपा रहा हो।
कभी-कभी
वह
किसी महँगी दुकान में
अंदर चला भी जाता है
एसी की ठंडक में
थोड़ी देर खड़ा रहता है,
किसी शर्ट को छूता है,
और
फिर धीरे से
बाहर आ जाता है
जैसे
किसी और की दुनिया में
बस मेहमान बनकर आया हो।
वह आदमी
कुछ नहीं खरीदता
पर
बहुत कुछ लेकर जाता है
थोड़ी-सी चाह,
थोड़ी-सी शर्म,
थोड़ी-सी हँसी,
और
थोड़ी-सी चुप्पी।
मैंने एक दिन पूछा
"कुछ लिया नहीं?"
वह बोला
"घूमने आया था…"
और इस "घूमने" में
इतनी गहराई थी
कि मैं
अपनी भरी हुई थैली
थोड़ी हल्की महसूस करने लगा।
मैं जानता हूँ
यह कविता
उस तक पहुँचेगी
वह पढ़ेगा,
हल्का-सा हँसेगा,
और कहेगा
"अरे! इतना भी क्या…"
पर
अंदर ही अंदर
थोड़ा और भर जाएगा।
जाने क्यों मन करता है
हर उस आदमी के सामने
उसे खड़ा कर दूँ
जो मॉल में
सिर्फ़ खरीदने आता है
और कहूँ
देखो!
यह आदमी
कुछ खरीदे बिना भी
ज़िन्दगी को देख रहा है
और तुम
सब कुछ खरीदकर भी
शायद कुछ नहीं देख पा रहे।
अरे ओ खाली जेब वाले आदमी!
तुम्हारी यह चुप चाल
कितनी बड़ी कहानी है
आओ,
आज
मॉल की रोशनी से बाहर निकलो
और एक चाय की दुकान पर
बैठकर
थोड़ी-सी दुनिया
अपने हिसाब से जी लो यार!
मुकेश ,,,,,,
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