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Tuesday, 31 March 2026

घर में रहकर भी घर से बाहर हो चुकी स्त्री

घर में रहकर भी घर से बाहर हो चुकी स्त्री

(जिसकी ज़रूरतें अब सिर्फ़ काम तक सीमित हैं) 


जब तक

किसी घर के बीचों-बीच

एक स्त्री

रहकर भी

घर से बाहर हो चुकी है

तब तक

दीवारें सिर्फ़ दीवारें हैं दोस्तों,

घर नहीं।


वह स्त्री

जिसके कदमों की आहट से

कभी सुबह होती थी,

जिसकी हँसी से

दोपहर हल्की हो जाती थी


अब

उसी के होने का मतलब

सिर्फ़ काम रह गया है।


वह उठती है

सबसे पहले,

सोती है

सबके बाद,


पर

उसके बीच का पूरा दिन

किसी और का होता है।


रसोई में

उसकी उँगलियाँ

रोटी बेलती हैं,

सब्ज़ी काटती हैं,

चाय बनाती हैं


पर

कोई नहीं पूछता

"तुमने खाया?"


वह बोलती है

तो बस काम के लिए

"दूध रख दिया है"

"कपड़े सुखा दिए हैं"


उसकी आवाज़

धीरे-धीरे

निर्देश बन गई है,

बात नहीं।


घर में

हर चीज़ अपनी जगह पर है

कपड़े, बर्तन, बच्चे, समय


बस

वह खुद

कहीं नहीं है।


कभी

आईने के सामने रुकती है

अपने चेहरे को देखती है,

जैसे

पहचानने की कोशिश कर रही हो


"मैं… कौन हूँ अब?"


उसकी पसंद

धीरे-धीरे

गायब हो गई है

कपड़े वही

जो घर को ठीक लगें,

खाना वही

जो सबको पसंद हो


उसकी अपनी भूख

कब की

चुप हो चुकी है।


हँसी भी आती है उसे

पर

हल्की-सी,

संभलकर


जैसे

ज़्यादा हँसना

अब उसके हिस्से में नहीं।


बीमार पड़ती है

तो भी

काम करती है

दवा खाकर

फिर खड़ी हो जाती है


क्योंकि

उसके रुकने से

घर रुक जाता है।


कभी

कोई मेहमान पूछ ले

"क्या करती हैं आप?"


तो वह मुस्कुरा देती है

और जवाब

गले में ही रह जाता है।


मैंने एक दिन पूछा

"थकती नहीं?"


वह बोली

"आदत है…"


और इस "आदत" में

इतनी गहरी थकान थी

कि नींद भी

शायद उसे आराम न दे पाए।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगी,

थोड़ा ठहरेगी,

और फिर

किसी को आवाज़ देगी


"चाय बना दी है…"


जाने क्यों मन करता है

हर उस घर के सामने

इस स्त्री को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह औरत

गायब नहीं हुई है

बस

तुम्हारी नज़रों से

ओझल हो गई है।


अरे ओ घर में रहकर भी

घर से बाहर हो चुकी स्त्री!

तुम्हारी यह खामोशी

कोई हार नहीं


बस

एक लंबा इंतज़ार है

उस दिन का

जब कोई

तुमसे पूछेगा


"तुम कैसी हो?"


आओ,

आज

रसोई की आंच थोड़ी धीमी करो

और एक कप चाय में

अपना नाम घोल दो…


शायद

तुम खुद को

फिर से पा लो।


मुकेश ,,,,

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