तुम्हारी कमी में पूरी रात
तुम्हारी कमी में पूरी रात
मैंने ख़ामोशी को ओढ़ लिया
जैसे कोई फ़क़ीर
अपने ही दिल की चौखट पर
बैठा इंतज़ार करता हो।
चाँद भी था,
मगर उसकी रौशनी में
तुम्हारा अक्स नहीं था—
सिर्फ़ एक फीकी-सी उजास थी,
जो दिल तक पहुँचते-पहुँचते
थक जाती थी।
मैंने रात से पूछा
“क्या तुमने उसे देखा है?”
रात मुस्कुराई,
और मेरी तन्हाई को
और गहरा कर गई।
हर सांस में
तुम्हारा नाम था,
मगर लफ़्ज़ नहीं बने
बस एक अहसास था
जो सजदे में गिरकर
दुआ बनना चाहता था।
तुम्हारी कमी में पूरी रात
मैं खुद से मिलता रहा
और हर बार
तुम तक पहुँच जाता रहा।
शायद यही इश्क़ है
जहाँ जुदाई भी
वस्ल का एक और रास्ता बन जाती है।
मुकेश ,,,,,,,
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