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Saturday, 28 March 2026

तुम्हारी कमी में पूरी रात

 तुम्हारी कमी में पूरी रात


तुम्हारी कमी में पूरी रात

मैंने ख़ामोशी को ओढ़ लिया

जैसे कोई फ़क़ीर

अपने ही दिल की चौखट पर

बैठा इंतज़ार करता हो।


चाँद भी था,

मगर उसकी रौशनी में

तुम्हारा अक्स नहीं था—

सिर्फ़ एक फीकी-सी उजास थी,

जो दिल तक पहुँचते-पहुँचते

थक जाती थी।


मैंने रात से पूछा

“क्या तुमने उसे देखा है?”

रात मुस्कुराई,

और मेरी तन्हाई को

और गहरा कर गई।


हर सांस में

तुम्हारा नाम था,

मगर लफ़्ज़ नहीं बने

बस एक अहसास था

जो सजदे में गिरकर

दुआ बनना चाहता था।


तुम्हारी कमी में पूरी रात

मैं खुद से मिलता रहा

और हर बार

तुम तक पहुँच जाता रहा।


शायद यही इश्क़ है

जहाँ जुदाई भी

वस्ल का एक और रास्ता बन जाती है।


मुकेश ,,,,,,,

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