बेटी की शादी के बाद चुप हो गया पिता
जब तक
किसी घर के आँगन में
एक पिता
बेटी की विदाई के बाद
अपनी ही आवाज़ से
थोड़ा डरने लगता है
तब तक
घर पूरी तरह घर नहीं रहता दोस्तों!
वह पिता
जो पहले
ज़रा-ज़रा सी बात पर
आवाज़ लगा देता था
"अरे सुनती हो!"
"कहाँ हो?"
अब
दरवाज़े तक आकर
खुद ही लौट जाता है।
उसके कमरे में
अब भी
एक कोना वैसा ही है
जहाँ कभी
बेटी की हँसी
खिलखिलाती थी,
अब वहाँ
सिर्फ़
घड़ी की टिक-टिक है
और
कुछ पुरानी गूँजें।
वह पिता
जो बाज़ार से
उसकी पसंद का
छोटा-सा क्लिप,
या कोई दुपट्टा ले आता था
अब भी
कभी-कभी
यूँ ही रुक जाता है
उसी दुकान के सामने
फिर
बिना कुछ खरीदे
आगे बढ़ जाता है।
मोबाइल में
उसकी फोटो है
विदाई वाली भी,
बचपन वाली भी
कभी
ज़ूम करके देखता है चेहरा,
और
उँगली से
आँसू पोंछ देता है
जैसे स्क्रीन गीली हो गई हो।
फोन करता है
"खुश तो हो न?"
और
"हाँ पापा" सुनकर
थोड़ा हल्का होता है
पर
उस "हाँ" के बाद
जो खामोशी होती है
वहीं
वह फिर से
थोड़ा भारी हो जाता है।
घर में
सब कुछ है
पत्नी, बेटा, बहू,
टीवी, अख़बार, चाय
बस
एक आवाज़ कम है
जो
सबसे ज़्यादा हुआ करती थी।
वह पिता
अब कम बोलता है
ज्यादा सुनता है
जैसे
अपनी ही ज़िन्दगी को
दूर से देख रहा हो।
कभी
कोई पुराना खिलौना
हाथ में आ जाता है,
या
किसी कॉपी के पन्ने में
उसकी लिखावट
तो वह
थोड़ी देर के लिए
वापस
"पापा" बन जाता है
फिर
धीरे से
वर्तमान में लौट आता है।
मैंने एक दिन पूछा
"चुप क्यों रहते हो आजकल?"
वह मुस्कुराया
"आदत हो रही है…"
और इस "आदत" में
इतनी गहराई थी
कि मैं कुछ बोल नहीं पाया।
मैं जानता हूँ
यह कविता
उस तक पहुँचेगी
वह पढ़ेगा,
चश्मा उतारेगा,
आँखें पोंछेगा,
और कहेगा
"अरे… इतना भी क्या…"
पर
दिल में
थोड़ा और भर जाएगा।
जाने क्यों मन करता है
दुनिया के हर उस इंसान के सामने
इस पिता को खड़ा कर दूँ
और कहूँ
देखो!
यह आदमी
अपनी सबसे प्यारी आवाज़
खोकर भी
टूटा नहीं है
बस
थोड़ा-सा
खामोश हो गया है।
अरे ओ बेटी के पिता!
तुम्हारी यह चुप्पी भी
एक कविता है
आओ,
आज
पुरानी तस्वीरें निकालो
और एक कप चाय में
थोड़ी-सी यादें घोल दो…
शायद
तुम्हारी आवाज़
फिर से लौट आए
धीरे-धीरे।
मुकेश ,,,,
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