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Tuesday, 31 March 2026

अधेड़ होती स्त्री

 जब तक

किसी घर की खिड़की के पास

एक अधेड़ होती स्त्री

अपने चश्मे को थोड़ा ऊपर सरकाकर

मोबाइल की स्क्रीन में

अपना चेहरा ढूँढती हुई

ज़िंदा है

तब तक

ज़िन्दगी पूरी तरह बुझी नहीं है दोस्तों!


वह स्त्री

जिसकी कमर में हल्का-सा दर्द है,

पैरों में थकान की पुरानी गाँठें हैं,

और आँखों पर चश्मा

पर दिल में

अब भी एक छोटी-सी लड़की

चुपचाप मुस्कुरा रही है।


सुबह

वह तुलसी में पानी डालती है,

अगरबत्ती जलाती है,

कुछ मंत्र बुदबुदाती है


और उसी हाथ से

थोड़ी देर बाद

मोबाइल खोलकर

अपनी नई सेल्फी देखती है।


कभी बाल ठीक करती है,

कभी दुपट्टा सँवारती है,

और फिर

एक तस्वीर डाल देती है


कुछ ही देर में

लाइक्स टपकने लगते हैं

और उसके चेहरे पर

एक हल्की-सी रोशनी फैल जाती है

जैसे किसी ने

उसकी थकान पर फूल रख दिया हो।


मैसेंजर पर

कई नाम चमकते हैं

कुछ अनजान,

कुछ आधे-पहचाने


ज़्यादातर को

वह अनदेखा कर देती है,

पर एक-दो से

धीरे-धीरे बात करती है


एक दूरी बनाए रखते हुए,

जैसे कोई

नदी किनारे-किनारे चले

पर पानी में उतरे नहीं।


कभी-कभी

फिर भी धोखा खा जाती है

किसी शब्द पर भरोसा करके,

किसी आवाज़ को सच मानकर


फिर

थोड़ा टूटती है,

थोड़ा संभलती है,

और

अगली सुबह

फिर वही दिन शुरू कर देती है।


रील्स बनाती है

कभी किसी पुराने गाने पर,

कभी किसी भजन पर


उसकी आवाज़ में

थोड़ी कच्ची मिठास होती है,

और आँखों में

एक अनकही कहानी


वह अपने हुनर दिखाती है

रेसिपी, सिलाई, सजावट

जैसे

ज़िन्दगी के बिखरे टुकड़ों को

फिर से जोड़ रही हो।


पुरानी सहेलियाँ

अचानक मिल जाती हैं

फोन पर,

चैट में,

या कभी सचमुच


और फिर

घंटों चलती है बात

बचपन, स्कूल, शरारतें,

शादी, बच्चे, दुख-सुख


हँसी के बीच

कभी-कभी

आँसू भी चुपचाप गिर जाते हैं।


बहू की बात करती है

कभी तारीफ,

कभी शिकायत

पर एक अजीब-सा संतुलन बनाए रखती है,

जैसे

अपने ही घर में

न्यायाधीश बन गई हो।


कभी

जवानी के किसी नाम पर

हल्का-सा मुस्कुरा देती है

"अरे, वो भी क्या दिन थे…"


पर असली बात

वहीं रोक देती है

दिल के किसी कोने में

ताला लगाकर।


ज़िन्दगी

वह काट रही है

थोड़े सुख के साथ,

थोड़े दुख के साथ


जैसे

मीठी चाय में

हल्की-सी कड़वाहट भी हो।


व्रत हैं,

त्योहार हैं,

पूजा है


इन सबके सहारे

वह

दिनों को बाँधती रहती है,

और रातों को

थोड़ा हल्का करती रहती है।


मैंने एक दिन पूछा

"खुश हो?"


वह बोली

"हाँ…

जब फोन में लोग याद कर लेते हैं…"


और इस छोटे-से "हाँ" में

इतनी बड़ी तन्हाई थी

कि मैं चुप हो गया।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगी,

हल्का-सा मुस्कुराएगी,

और शायद

एक नई सेल्फी डाल दे


और मैं कहूँगा

"तुम्हारी यह मुस्कान ही

सबसे सच्ची पोस्ट है…"


जाने क्यों मन करता है

दुनिया के हर बेपरवाह इंसान के सामने

उसे खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह स्त्री

टूटी नहीं है

बस

धीरे-धीरे बदल रही है


इसकी आँखों में

अब भी एक सपना है

और दिल में

थोड़ी-सी जगह

अब भी खाली है।


अरे ओ अधेड़ होती स्त्री!

तुम्हारी यह

हल्की-सी थकी,

हल्की-सी चमकती ज़िन्दगी

कितनी खूबसूरत है…


आओ,

एक दिन

फोन साइड में रखो

और एक कप चाय में

अपनी कहानी घोल दो…


शायद

तुम्हें खुद ही

अपनी आवाज़

फिर से सुनाई दे जाए।


मुकेश ,,,,,

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