साठ बरस का आदमी - तीन

 जब तक

किसी कॉलोनी के गेट पर
सुबह-सुबह
एक साठ बरस का आदमी
हाथ में माला
और आँखों में आधी नींद लिए
ज़िंदा है—
तब तक
ज़िन्दगी पूरी तरह सीधी रेखा नहीं हुई दोस्तों!


वह आदमी
जो अलार्म से पहले ही उठ जाता है,
नल के पानी से मुँह धोकर
भगवान के सामने बैठ जाता है—

घंटी की आवाज़ में
थोड़ी-सी श्रद्धा,
थोड़ी-सी आदत,
और थोड़ी-सी
डर की झनकार होती है।


फिर निकल पड़ता है
टहलने—
ना किसी पहाड़ पर,
ना किसी जंगल में—
बस अपनी ही गली के गोल-गोल चक्कर में,

जहाँ
हर मोड़ पर
एक पहचान खड़ी मिलती है।


"अरे शर्मा जी!"
"कहो वर्मा जी!"

बात शुरू होती है
ब्लड प्रेशर से,
शुगर पर आती है,
और बहू-बेटों पर टिक जाती है—

कभी शिकायत,
कभी गर्व,
कभी तुलना,
कभी तंज—

जैसे
ज़िन्दगी एक अखबार हो
जिसे हर कोई
अपने हिसाब से पढ़ रहा हो।


हँसी भी होती है—
हल्की-सी,
थोड़ी फिसलती हुई—

कभी कोई पुराना मज़ाक,
कभी कोई ऐसा जुमला
जिसे सुनकर
सब हँसते भी हैं
और इधर-उधर भी देखने लगते हैं।


वह आदमी
चलते-चलते
कभी किसी गुज़रती हुई औरत को
ज़रा देर तक देख लेता है—
जैसे
समय को पलटकर देख रहा हो,
या
खुद को याद दिला रहा हो
कि वह अब भी
ज़िंदा है।


घर लौटता है—
टीवी चालू करता है,
न्यूज़ देखता है
और सरकार को
दिन का पहला आशीर्वाद देता है—

"सब बर्बाद कर दिया…"

और इसी वाक्य में
उसे एक अजीब-सी राहत मिलती है।


दवाइयाँ हैं—
समय पर,
नियम से—

और हर गोली के साथ
वह
अपनी बीमारी का एक नया अध्याय
दोहराता है—
इतने विस्तार से
कि डॉक्टर भी
शायद इतना न जानता हो।


मोबाइल पर
धीरे-धीरे स्क्रॉल करता है—
वीडियो, मैसेज, फोटो—

कभी हँसता है,
कभी सिर हिलाता है,
कभी कहता है—
"आजकल की पीढ़ी…"

और फिर
उसी स्क्रीन में
खो जाता है।


दरवाज़े की घंटी बजती है—
"Amazon!"

वह उठकर
दरवाज़ा खोलता है—
जैसे
अपने ही घर में
एक मेहमान बन गया हो—

पार्सल लेता है,
नाम पढ़ता है,
और सोचता है—
"क्या मंगाया होगा इन्होंने…"


कभी बाजार जाता है—
छोटी-छोटी चीज़ें खरीदता है,
जैसे
ज़िन्दगी के छोटे-छोटे हिस्सों को
अब भी अपने हाथ में रखना चाहता हो।


स्कूल बस के पास खड़ा रहता है—
छोटे बच्चों को चढ़ाता है,
उतारता है—

उनके बैग से भारी
अपनी उम्र को
हल्का करता हुआ।


दिन ऐसे ही
घूमता रहता है—
सुबह की माला से
रात की दवा तक—

एक ही ढर्रा,
एक ही लय—

जिसमें
वह आदमी
कभी खुश है,
कभी थका हुआ,
कभी बस
चुप।


मैंने एक दिन पूछा—
"खुश हो?"

वह बोला—
"हाँ भी…
और नहीं भी…"

और इस "हाँ-नहीं" में
पूरी ज़िन्दगी का सच था।


मैं जानता हूँ
यह कविता
उस तक पहुँचेगी—
वह पढ़ेगा,
हल्का-सा मुस्कुराएगा,
और कहेगा—

"अरे! ये तो मेरी ही दिनचर्या है…"

और मैं कहूँगा—
"हाँ…
और यही तुम्हारी सबसे बड़ी कविता भी।"


जाने क्यों मन करता है—
दुनिया के हर भागते हुए आदमी को
इसके सामने खड़ा कर दूँ—
और कहूँ—

देखो!
यह आदमी
कुछ खास नहीं करता—
बस
जीता है—

धीरे-धीरे,
दोहराते हुए,
थोड़ा-थोड़ा टूटते हुए—
और फिर भी
हर सुबह उठ जाता है।


अरे ओ साठ साल के आदमी!
तुम्हारी यह
सीधी-सादी, उलझी हुई ज़िन्दगी—
कितनी गहरी है…

आओ,
आज फिर
टीवी की आवाज़ थोड़ी कम करो—
और एक कप चाय में
थोड़ी-सी बात मिला दो…

शायद
ज़िन्दगी का स्वाद
थोड़ा बदल जाए यार!

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