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Tuesday, 31 March 2026

साठ बरस का आदमी - दो

 जब तक

किसी मोहल्ले के कोने में

एक साठ बरस का आदमी

अपनी ऐनक के पीछे से

दुनिया को आधा सच, आधा सपना देखता हुआ

ज़िंदा है—

तब तक

इंसान पूरी तरह संत नहीं हुआ दोस्तों!


वह आदमी

जो सुबह उठकर

राम-नाम जपता है,

और शाम को

फेसबुक पर किसी अनजान मुस्कान को

थोड़ी देर ज़्यादा देख लेता है


जिसके भीतर

धूप भी है,

और एक कोना

अब भी हल्की-सी धुंध में भीगा हुआ है।


वह कहता है—

"अब उम्र क्या रही इन सब बातों की…"

लेकिन

किसी "नमस्ते अंकल" में

उसे एक छोटा-सा वसंत सुनाई दे जाता है।


कभी-कभी

पुराने दोस्तों के व्हाट्सऐप ग्रुप में

हँसी थोड़ी फिसल जाती है

हल्की-सी शरारत,

थोड़ी-सी पुरानी आदतें


और फिर

वही आदमी

रात को सोने से पहले

गीता का एक श्लोक भी पढ़ लेता है।


उसकी उँगलियाँ

मोबाइल की स्क्रीन पर

धीरे-धीरे चलती हैं—

जैसे कोई

पुरानी यादों को टटोल रहा हो।


कभी

कुछ ऐसी तस्वीरों पर भी ठहर जाती हैं

जिन्हें वह

दुनिया से छुपाकर देखता है


फिर

अचानक स्क्रीन बंद कर देता है,

जैसे अपने ही मन से

नज़र चुरा ली हो।


शुगर है,

ब्लड प्रेशर है,

घुटनों में दर्द है

लेकिन

ज़िन्दगी से हार मानना

उसे आता नहीं।


दवा की शीशी के साथ

वह

अब भी

उम्मीद की एक छोटी गोली

हर रोज़ निगल लेता है।


उसके भीतर

एक साथ कई आदमी रहते हैं

एक जो प्रेम ढूँढता है,

एक जो थककर सो जाना चाहता है,

एक जो थोड़ा-सा स्वार्थी है,

थोड़ा-सा आलसी,

और

एक जो अब भी

अपने को बहुत समझदार समझता है।


कभी-कभी

वह खुद पर हँस भी लेता है

"क्या कर रहा हूँ मैं इस उम्र में?"


और फिर

चुपचाप

चाय में बिस्कुट डुबोते हुए

ज़िन्दगी को

थोड़ा और मुलायम बना लेता है।


पड़ोस की आवाज़ें,

गली के लोग,

किसी की हँसी,

किसी की नज़र


इन सबमें

वह ढूँढता है

एक छोटा-सा

सुरक्षित कोना

जहाँ

वह थोड़ी देर के लिए

सिर्फ "आदमी" रह सके,

"उम्र" नहीं।


मैंने एक दिन पूछा

"थकते नहीं हो?"


वह मुस्कुराया

"थोड़ा-थोड़ा…

पर जीना भी तो है…"


और उस "जीना" में

इतनी जिद थी

कि मुझे

ज़िन्दगी पर फिर से भरोसा हो गया।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह हँसेगा,

थोड़ा झेंपेगा,

और कहेगा


"अरे यार!

मुझे ही पकड़ लिया तुमने?"


और मैं कहूँगा

"तुम जैसे लोग ही

हम सबका सच हो…"


जाने क्यों मन करता है

दुनिया के हर नकली संत के सामने

इस आदमी को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह आदमी

इच्छाओं से बना है,

कमज़ोरियों से बना है,

और फिर भी

हर सुबह

थोड़ा बेहतर बनने की कोशिश करता है


इसके सिर पर हाथ रखकर कसम खाओ—

कि इंसान को

पूरी तरह काटकर

सिर्फ आदर्श नहीं बनाओगे!


अरे ओ साठ साल के आदमी!

तुम्हारी यह उलझी हुई कहानी भी

कितनी सच्ची है


आओ,

एक कप चाय हो जाए—

थोड़ी-सी शक्कर कम,

थोड़ी-सी बात ज़्यादा…


और

थोड़ी-सी ज़िन्दगी

फिर से हँस दी जाए यार!


मुकेश ,,,,,,,,

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