किसी मोड़ पर खड़ी हुई याद
किसी मोड़ पर
खड़ी हुई है
एक पुरानी याद।
न आगे बढ़ती है,
न पीछे लौटती है—
बस
रास्तों को देखती रहती है
चुपचाप।
कभी कोई गुज़रता है
तो वह
हल्के से
दिल को छू जाती है।
जैसे
वक़्त आगे बढ़ गया हो,
पर
एक पल
अब भी वहीं ठहरा हो।
मुकेश्,,,
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