टूटी हुई छतरी
टूटी हुई छतरी
बारिश के हर बूंद को जानती है
उसकी हँसी और उसके ग़म को
सर्द हवा में काँपती है
और धूप में सिकुड़ती है।
यह दिखावे की दुकान में नहीं मिलती
यह मिलती है उस चाय वाले के हाथ में
जो भीगते रास्तों पर
अपने ही सपने संभालता है।
जब छतरी टूटती है
तो सिर्फ़ धातु नहीं मुड़ती
छाया और सुरक्षा के बीच की दूरी
थोड़ी और बढ़ जाती है
और हर बूंद सीधे उतरती है
जैसे सच सामने खड़ा हो।
वह बारिश में भीगती है चुपचाप
और धूप में सुखते-सुखते
अपने को संवारती है
फिर भी कहीं जाने से डरती नहीं।
टूटी हुई छतरी जानती है
कि आसमान कभी खाली नहीं रहता
सिर्फ़ हमारी उम्मीदें
कभी-कभी ढह जाती हैं
और हम फिर उसे उठाकर
किसी पुराने डोर से जोड़ लेते हैं।
यह छतरी
दरअसल हमारी हिम्मत है
भीग कर भी चलने की,
सर्द हवा में भी
अपने पैरों को बचाने की।
मुकेश ,,,,,,,
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