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Wednesday, 25 March 2026

टूटी हुई छतरी

 टूटी हुई छतरी


टूटी हुई छतरी

बारिश के हर बूंद को जानती है

उसकी हँसी और उसके ग़म को

सर्द हवा में काँपती है

और धूप में सिकुड़ती है।


यह दिखावे की दुकान में नहीं मिलती

यह मिलती है उस चाय वाले के हाथ में

जो भीगते रास्तों पर

अपने ही सपने संभालता है।


जब छतरी टूटती है

तो सिर्फ़ धातु नहीं मुड़ती

छाया और सुरक्षा के बीच की दूरी

थोड़ी और बढ़ जाती है

और हर बूंद सीधे उतरती है

जैसे सच सामने खड़ा हो।


वह बारिश में भीगती है चुपचाप

और धूप में सुखते-सुखते

अपने को संवारती है

फिर भी कहीं जाने से डरती नहीं।


टूटी हुई छतरी जानती है

कि आसमान कभी खाली नहीं रहता

सिर्फ़ हमारी उम्मीदें

कभी-कभी ढह जाती हैं

और हम फिर उसे उठाकर

किसी पुराने डोर से जोड़ लेते हैं।


यह छतरी

दरअसल हमारी हिम्मत है

भीग कर भी चलने की,

सर्द हवा में भी

अपने पैरों को बचाने की।


मुकेश ,,,,,,,

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