इश्क़ एक ख़ुशबू है
इश्क़
किसी आवाज़ का मोहताज नहीं होता
वो तो बस
एक ख़ामोश ख़ुशबू है
जो रूह की गलियों में
धीरे-धीरे फैल जाती है।
न उसे देखा जा सकता है,
न मुट्ठी में पकड़ा जा सकता है—
मगर जब वो दिल में उतर जाए
तो पूरी ज़िंदगी
महक उठती है।
जैसे किसी सूने बाग़ में
रात के वक़्त
मोगरे का एक फूल
चुपचाप खिल जाए
और हवा
उसकी महक को
दूर तक ले जाए।
मोहब्बत भी
कुछ ऐसी ही होती है
वो क़ैद नहीं होती,
बस महसूस होती है।
अगर दिल सच्चा हो
तो उसकी महक
रूह तक पहुँच जाती है,
और अगर इरादे हल्के हों
तो वो हवा में घुलकर
गुम हो जाती है।
शायद इसी लिए
सूफ़ी कहते हैं
इश्क़
कोई रिश्ता नहीं,
कोई दावा नहीं
बस
एक ख़ुशबू है
जो कभी दिल में
और कभी दुआ में
महकती रहती है।
मुकेश ,,,,,,,
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