इश्क़ एक ख़ुशबू है
चाहे जिस्मानी हो
या रूहानी।
वो दिल के बाग़ में
चुपचाप खिलने वाला
एक ऐसा फूल है
जिसकी महक
लफ़्ज़ों से ज़्यादा
एहसास में बसती है।
कभी
किसी की आँखों की नमी में
वो महक उठती है,
कभी
किसी मुस्कान की हल्की-सी लकीर में
अपना पता दे जाती है।
जिस्मानी इश्क़
वसंत की हवा की तरह होता है
नर्म, मदहोश
और फूलों की खुशबू से भरा हुआ।
और रूहानी इश्क़
इबादत की तरह होता है
जहाँ दिल
ख़ामोशी में भी
एक नूर महसूस करता है।
मगर इश्क़ की असल पहचान
उसकी सच्चाई में है
क्योंकि खुशबू
अगर असली हो
तो वो देर तक ठहरती है,
और अगर बनावटी हो
तो हवा का एक झोंका ही
उसे मिटा देता है।
इसलिए
इश्क़ को पकड़ो मत
बस उसे
दिल की फिज़ा में
महकने दो।
क्योंकि
इश्क़ सच में एक ख़ुशबू है
चाहे वो जिस्मानी हो
या रूहानी।
मुकेश ,,,,,,,,,
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