इश्क़ का ख़ामोश फ़लसफ़ा
इश्क़
हमेशा आवाज़ में नहीं बोलता
कभी-कभी
वो ख़ामोशी की तहों में छुपा
दिल की धड़कनों से
अपना मतलब कह देता है।
न उसमें
किसी को पाने की ज़िद होती है,
न किसी को रोक लेने की चाह
वो तो बस
एक नर्म-सी रौशनी है
जो रूह के अँधेरे को
चुपचाप उजाला दे जाती है।
कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में आते हैं
जैसे कोई हल्की हवा
गुज़र जाए किसी बाग़ से
फूलों की महक छोड़कर
फिर कहीं दूर खो जाए।
और कुछ रूहें
ऐसे मिलती हैं
जैसे दो दरिया
बिना शोर किए
एक ही समंदर में उतर जाएँ।
मगर इश्क़ का असली फ़लसफ़ा
क़ैद में नहीं होता
वो तो रिहाई की उस नर्मी में है
जहाँ दिल
किसी को रोकता नहीं।
बस
अपनी मोहब्बत की शम्अ जलाकर
इतना कह देता है
अगर तुम्हारी राह
मेरी रौशनी से मिलती हो
तो ठहर जाना,
और अगर तुम्हारा सफ़र
किसी और अफ़क़ की तरफ़ जाता हो
तो मेरी दुआओं के साथ
चले जाना।
यही
इश्क़ का ख़ामोश फ़लसफ़ा है
जहाँ मोहब्बत
हक़ नहीं माँगती,
बस
रूह को आज़ाद कर देती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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