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Saturday, 14 March 2026

रहीम : तलवार और शब्द के बीच

 रहीम : तलवार और शब्द के बीच


इतिहास के पन्नों में

कभी-कभी

कुछ नाम ऐसे लिखे जाते हैं

जो शोर से नहीं

शब्दों की विनम्रता से चमकते हैं।


रहीम भी

ऐसा ही एक नाम था


हाथ में

मुग़ल सल्तनत की तलवार,

और होंठों पर

ब्रजभाषा का एक छोटा-सा दोहा।


वह सेनापति भी था

और कवि भी

जैसे

लोहे की चमक में

अचानक

कोई कमल खिल उठे।


जब उसने लिखा—

“रहिमन धागा प्रेम का…”


तो लगता है

इतिहास की कठोर दीवारों के बीच

किसी ने

मानवता का एक दीप जला दिया हो।


वह जानता था

राजनीति बदलती है,

साम्राज्य मिट जाते हैं,


पर

एक सच्चा शब्द

समय से भी लंबी उम्र पाता है।


इसलिए

रहीम की तलवार

शायद इतिहास में रह गई,


पर उसके दोहे

आज भी

लोगों के दिलों में

धीरे-धीरे बोलते हैं


जैसे

सदियों बाद भी

कोई पुराना संत

हमें प्रेम का

सबसे सरल व्याकरण सिखा रहा हो।


मुकेश ,,

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