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Wednesday, 1 April 2026

डिजिटल शहर में खोते हुए लोग

 डिजिटल शहर में खोते हुए लोग


वे ऑनलाइन रहने वाले

लोगों से ज़्यादा

ऑनलाइन रहने वाले दिल हैं


उनके मोबाइल के स्क्रीन टाइम देखिए

व्हाट्सऐप

इंस्टाग्राम

रील्स

नोटिफिकेशन

और अनगिनत अनरीड मैसेज मिलेंगे


उन्हें अपनों की फ़िक्र भी है

मगर अपने अब

डीपी में सिमट चुके हैं

उनकी हँसी अब

इमोजी बन चुकी है


"कैसे हो?" के जवाब में : 👍

👍 के जवाब में : ❤️

❤️ के जवाब में : Seen

और Seen के जवाब में

एक लंबी चुप्पी—

हमारे समय की सबसे आम भाषा है


लोग हर दिन सुनना चाहते हैं

"चलो मिलते हैं कभी!"

मगर ऐसा हो नहीं पाता

कितना आर्टिफ़िशियल हँसते हैं

वीडियो कॉल पर लोग!


मेट्रो और कैफ़े में

स्क्रीन में झाँकते हैं लोग

खुद से बचने के लिए

दूसरों में खोते हैं लोग


पास बैठा इंसान

किसी दूर के स्टेटस से हार जाता है

कुछ लोगों के लिए

वे सोशल नहीं

सिर्फ़ डेटा बन चुके हैं!


कभी नहीं बताते लोग

आज किस पोस्ट ने उन्हें चुभा

किस कमेंट ने उन्हें तोड़ा

किस तुलना ने उन्हें छोटा किया


वे जब रात को फोन रखते हैं

ऐसा लगता है जैसे

आँखों में नीली रोशनी भर गई हो


एक मिनट भी रुकते नहीं

फिर से स्क्रॉल करने लगते हैं

जाँचते हैं किसने देखा

किसने नहीं


फिर वे थक जाते हैं

और फिर भी रुकते नहीं


सबको अपनी ज़िंदगी का

सुंदर हिस्सा दिखाकर

अंदर के अँधेरे को

एयरप्लेन मोड कर देते हैं


कोई चैट खोलता है

कोई रील

तो कोई पुरानी तस्वीरें

यादों को ज़ूम करता है


जब सब कुछ बंद कर

फोन साइड में रखते हैं

एक खालीपन

उनके सीने में उभरता है


और उन्हें नींद नहीं आती


उस खालीपन के बारे में

न कोई फ्रेंड जानता है

न कोई फॉलोवर समझता है

और बड़े से बड़ा एल्गोरिदम भी

इस दर्द को नहीं पढ़ पाता


ऑनलाइन रहने वाले लोग

सुबह उठकर

फिर से खुद को

ऑनलाइन कर लेते हैं!


मुकेश ,,,,,,,,

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