रिश्तों के भंवर में फँसी लड़की
वो फँसी हुई है...
जैसे नदी के बीचों-बीच
एक चुप चक्कर खाता पानी,
जिसे किनारे याद हैं
पर पहुँच नहीं पाता।
उसकी आँखों में
कई रास्तों की धूल है,
हर रास्ता किसी अपने तक जाता है
और हर अपना
उसे थोड़ा और उलझा देता है।
वो हँसती है...
पर उसकी हँसी में
किसी और के फैसलों की आहट होती है,
जैसे किसी और ने
उसके होंठों पर मुस्कान रख दी हो।
उसके "हाँ" में
अक्सर एक थका हुआ "ना" छुपा होता है,
और उसके "ना" में
एक अधूरा-सा डर
कि कहीं सब छूट न जाए।
वो हर किसी की हो जाती है
थोड़ी-थोड़ी
माँ की उम्मीद,
पिता की इज़्ज़त,
समाज की मर्यादा,
और किसी के सपनों की अधूरी तस्वीर।
पर खुद की?
वो खुद की कभी नहीं हो पाती।
उसके भीतर
एक कमरा है बंद,
जहाँ वो सच में रहती है
बिना रिश्तों के नाम के,
बिना किसी की आवाज़ के,
सिर्फ़ अपनी धड़कनों के साथ।
कभी-कभी
वो उस कमरे का दरवाज़ा खोलती है,
थोड़ी-सी हवा बाहर आती है
और फिर
कोई पुकार उसे वापस खींच लेती है
उसी भंवर में।
वो डूबती नहीं...
बस तैरती रहती है,
थक कर भी,
टूट कर भी
क्योंकि उसे सिखाया गया है
कि लड़की होना
अक्सर
अपने ही किनारों से दूर रहना है।
और वो...
अब भी वहीं है
रिश्तों के भंवर में,
धीरे-धीरे
खुद से दूर जाती हुई।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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