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Thursday, 2 April 2026

इब्नबतूता का जूता और कोलम्बस की नाव

 इब्नबतूता का जूता और कोलम्बस की नाव


सुमी,

आज

अलमारी के कोने में

एक पुराना जूता मिला

धूल से भरा,

थोड़ा फटा हुआ


उसे देखते ही

याद आया

इब्नबतूता।


कितनी दूर चला होगा वो

रेगिस्तानों से,

समंदरों से,

अजनबी शहरों से

सिर्फ़

चलते रहने के लिए।


और

सोचा

क्या प्रेम भी

कुछ ऐसा ही नहीं?


एक सफ़र

जिसका कोई नक्शा नहीं,

कोई ठिकाना नहीं

बस

चलते जाना है।


फिर

खिड़की से बाहर देखा

आसमान में

बादल ऐसे तैर रहे थे

जैसे

कोई नाव हो


और

याद आया

कोलम्बस।


वो भी तो

निकला था

बिना जाने

कि कहाँ पहुँचेगा

बस

यक़ीन के सहारे।


सुमी,

इब्नबतूता का जूता

और कोलम्बस की नाव

दोनों में

एक ही बात है


एक

ज़मीन पर चलता है,

दूसरा

पानी पर

पर

दोनों को

मंज़िल से ज़्यादा

सफ़र पर भरोसा होता है।


मुझे लगता है

प्रेम भी

इन दोनों के बीच कहीं है


कभी

जूते की तरह

धीरे-धीरे घिसता हुआ,

कभी

नाव की तरह

अनजान लहरों पर डोलता हुआ।


हम

कभी-कभी

इब्नबतूता हो जाते हैं

छोटे-छोटे क़दमों में

तुम तक पहुँचने की कोशिश करते हुए।


और

कभी

कोलम्बस

एक ही छलाँग में

तुम्हें खोज लेने की उम्मीद में।


पर सुमी,

सच तो यह है

न जूता

तुम तक पहुँचा,

न नाव


क्योंकि

तुम

कोई जगह नहीं हो,

कोई देश नहीं


तुम

एक अहसास हो

जिस तक

न चला जा सकता है,

न तैरा।


तुम तक पहुँचने के लिए

ना जूता चाहिए,

ना नाव


बस

खुद को

थोड़ा-थोड़ा छोड़ना पड़ता है।


तो आज

मैंने

वो पुराना जूता

वहीं रख दिया

और

आसमान में तैरती नाव को

बस देखता रहा


क्योंकि

अब समझ आया


तुम तक पहुँचने का रास्ता

बाहर नहीं,

अंदर है।


तुम्हारा,

जो अब सफ़र में है

मंज़िल में नहीं।


मुकेश इलाहाबादी


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