आईनों के शहर में खोया हुआ चेहरा
कहते हैं
इस शहर में कोई अजनबी नहीं होता,
क्योंकि हर कोई
खुद को हर जगह देख सकता है…
मैं जब उस शहर में दाख़िल हुआ,
तो सबसे पहले
अपनी ही झलक से टकराया
सामने की दीवार पर
एक बड़ा-सा आईना था,
जिसमें मैं खड़ा था…
मगर कुछ अजीब था…
वो मैं था
पर वैसा नहीं,
जैसा मैं खुद को जानता हूँ…
वो मुस्कुरा रहा था
जबकि मैं अंदर से ख़ामोश था।
मैंने आगे क़दम बढ़ाया—
तो बायीं तरफ़ एक और आईना था…
इस बार
मैं गंभीर दिख रहा था,
जैसे कोई बहुत समझदार आदमी…
मैं ठिठक गया…
ये मैं हूँ…?
या वो,
जो मैं बनना चाहता था…?
शहर में हर तरफ़
आईने ही आईने थे
किसी में मैं सफल था,
किसी में टूटा हुआ,
किसी में बेख़ौफ़,
किसी में बिल्कुल खाली…
मगर एक भी आईना
ऐसा नहीं था
जिसमें मैं “वैसा” दिखूँ
जैसा मैं इस वक़्त हूँ…
मैं थक गया
खुद को इतने रूपों में देखकर…
तभी
एक गली के कोने में
मुझे एक टूटा हुआ आईना मिला…
उसमें मेरा चेहरा
पूरा नहीं दिख रहा था—
बस टुकड़ों में…
मगर पहली बार—
वो सच्चा लग रहा था।
मैंने उसे हाथ में उठाया—
और महसूस किया…
शायद सच कभी पूरा नहीं होता,
वो हमेशा टुकड़ों में ही मिलता है…
और शायद…
खुद को पाने के लिए
पहले
इन सारे “सही दिखने वाले” आईनों को
छोड़ना पड़ता है…
हर आईने में खुद को अलग पाया मैंने,
टूटे हुए शीशे में ही सच पाया मैंने।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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