आईनों के शहर से बाहर निकलना
शहर के आख़िरी छोर पर
कोई दरवाज़ा नहीं था
बस धुँध थी,
और उस धुँध के पार
एक अजीब-सी ख़ामोशी…
मैंने पीछे मुड़कर देखा
आईनों का वो शहर
अब भी चमक रहा था,
जैसे हर टुकड़ा मुझे पुकार रहा हो
“वापस आओ,
यहाँ तुम कभी अधूरे नहीं लगोगे…”
मैं मुस्कुरा दिया
क्योंकि अब मैं जान चुका था,
कि पूरा दिखना
और पूरा होना
दो अलग बातें हैं…
मैंने क़दम आगे बढ़ाया
धुँध ने मुझे निगल लिया…
कुछ पल तक
कुछ भी साफ़ नहीं था
न चेहरा,
न रास्ता,
न कोई आवाज़…
बस
सांसों की हल्की आहट
और दिल की धीमी धड़कन…
और फिर
धीरे-धीरे
धुँध के भीतर
कुछ उभरने लगा…
कोई आईना नहीं था अब,
कोई परछाईं भी नहीं…
सिर्फ़ एक खालीपन था
गहरा,
अथाह,
और अजीब तरह से सुकून भरा…
मैंने खुद को टटोलना चाहा
पर इस बार
कोई “मैं” नहीं मिला…
ना वो जो मुस्कुराता था,
ना वो जो टूटा था,
ना वो जो बनने की कोशिश करता था…
मैं घबरा गया…
अगर मैं ये सब नहीं हूँ
तो फिर मैं हूँ कौन…?
उसी वक़्त
उस खालीपन के भीतर
एक बहुत हल्की-सी आवाज़ गूँजी
“तू वो है,
जो इन सबको देख रहा था…”
मैं ठहर गया…
पहली बार
मैंने खुद को
देखने की कोशिश नहीं की,
बल्कि
महसूस करने लगा…
और तभी समझ आया
आईनों का शहर
झूठ नहीं था,
पर वो पूरा सच भी नहीं था…
वो बस
मेरे “रूप” थे
मेरा “अस्तित्व” नहीं…
अस्तित्व
तो इस ख़ामोशी में था,
जहाँ कोई चेहरा नहीं,
पर एक अजीब-सी पहचान थी…
मैंने आँखें बंद कीं
और पहली बार,
अंदर कोई तस्वीर नहीं उभरी…
सिर्फ़ एक अहसास था
जैसे कोई
मुझे मुझसे पहले से जानता हो…
शायद…
वही “मैं” हूँ…
जो कभी आईने में नहीं दिखता।
आईनों से निकल कर जब ख़ुद में उतर गया,
चेहरा नहीं मिला—मगर मैं मुकम्मल नज़र आया।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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