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Sunday, 26 April 2026

ख़ामोशी का घर

 ख़ामोशी का घर


उस दिन के बाद

मैंने आईनों को देखना छोड़ दिया


अब कोई चेहरा

मुझे पुकारता नहीं था,

कोई शक्ल

मुझे बहलाती नहीं थी…


मगर एक अजीब बात हुई

जितना मैं बाहर से खाली होता गया,

अंदर कुछ उतना ही

भरता चला गया…


जैसे

ख़ामोशी भी

एक तरह की आवाज़ होती है


धीमी,

मगर बहुत गहरी…


मैं उसी आवाज़ के पीछे

चल पड़ा


और धीरे-धीरे

मैं एक ऐसे घर तक पहुँचा

जिसका कोई दरवाज़ा नहीं था…


ना दीवारें थीं,

ना छत…


फिर भी

वो “घर” था


क्योंकि वहाँ

पहली बार

मुझे “ठहराव” मिला…


मैंने चारों तरफ़ देखा


कुछ भी नहीं था वहाँ,

फिर भी

सब कुछ था…


कोई याद नहीं,

कोई ख़्वाब नहीं,

कोई डर नहीं…


बस एक सादा-सा

वजूद


जो ना बनना चाहता था,

ना बिगड़ना…


मैं वहीं बैठ गया


और महसूस किया कि

अब मुझे खुद को

समझाने की ज़रूरत नहीं रही…


न ही

किसी को दिखाने की…


वक़्त जैसे

धीरे-धीरे पिघलने लगा


हर पल

अपने आप में पूरा था…


तभी

उस ख़ामोशी ने फिर से

मुझसे कहा


“अब तू लौट सकता है…”


मैंने आँखें खोलीं


“कहाँ…?”

कोई जवाब नहीं आया


सिर्फ़ एक एहसास था


कि अब जहाँ भी जाऊँगा,

वो जगह

“बाहर” नहीं होगी…


वो मेरे साथ चलेगी…


मैं उठा


और बिना किसी जल्दबाज़ी के

चल पड़ा…


अब कोई मंज़िल नहीं थी


क्योंकि

मैं खुद ही

अपनी मंज़िल बन चुका था…


ख़ामोशी के घर में जब ठहराव मिला,

खुद से ना मिला—मगर हर जवाब मिला।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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