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Monday, 27 April 2026

आईनों का घर

 आईनों का घर


आईनों के घर

ख़ूबसूरत तो होने ही हैं


हर दीवार चमकती है,

हर कोना

रोशनी को कई गुना बढ़ा देता है…


तुम जहाँ भी खड़े हो

तुम्हारी मौजूदगी

एक उत्सव बन जाती है…


मगर

इस चमक के नीचे

एक खामोश डर पलता है


पत्थरों का डर…


क्योंकि

यहाँ हर चीज़

टूटने के लिए बनी है


बस एक वार,

एक लापरवाही,

एक सच्चाई की ठोकर…


और पूरी दुनिया

किरचों में बदल सकती है…


मैं उस घर में रहा हूँ


बहुत सलीके से चला,

धीरे-धीरे साँस ली,

हर लफ़्ज़ तौलकर कहा…


कि कहीं

मेरे ही हाथों

मेरी ही दुनिया न टूट जाए…


मगर

ये कैसी ज़िंदगी थी—?


जहाँ

चलना भी हिसाब से,

बोलना भी इजाज़त से…


जहाँ

हर ख़ुशी के पीछे

एक आशंका खड़ी हो


“अगर ये टूट गया तो…?”


मैंने देखा


लोग अपने-अपने

आईनों के घरों में

क़ैद हैं


ख़ूबसूरती के बदले

आज़ादी गिरवी रखकर…


हर कोई

अपने पत्थरों को छुपा रहा है


अपनी सच्चाइयों को,

अपने ग़ुस्से को,

अपनी बेबाक़ी को…


क्योंकि

यहाँ पत्थर

सिर्फ़ बाहर से नहीं आते


कई बार

वो अंदर ही पैदा होते हैं…


और वही

सबसे ज़्यादा तोड़ते हैं…


एक दिन

मैंने एक पत्थर उठाया


हाथ काँप रहे थे…


मगर

इस बार डर से ज़्यादा

थकान थी…


मैंने सोचा

क्या ज़िंदगी भर

बस बचाता ही रहूँगा…?


या कभी

टूटने की आवाज़ भी सुनूँगा…?


और फिर

मैंने पत्थर छोड़ दिया…


आवाज़ गूँजी

तेज़,

बेरहम,

निर्णायक…


आईने बिखर गए


हर तरफ़

चमक नहीं,

किरचें थीं…


मगर

उस बिखराव में

एक अजीब-सी राहत थी…


जैसे

कोई क़ैद टूट गई हो…


अब

कोई डर नहीं था


क्योंकि

अब कुछ बचाना नहीं था…


मैं उन किरचों के बीच

खड़ा था


ज़ख़्मी,

मगर पहली बार

ज़िंदा…


आईनों के घर में हर लम्हा डर के साए थे,

पत्थर जो गिरा—तो हम भी अपने हो आए थे।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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