पारदर्शी आईने
कुछ आईने
इतने पारदर्शी होते हैं
कि पता ही नहीं चलता
वे आईना हैं भी… या नहीं…
वे दीवार की तरह खड़े रहते हैं
साफ़, सपाट, निर्दोष
और तुम
उन्हें रास्ता समझकर
उनकी तरफ़ बढ़ जाते हो…
बिना शक,
बिना ठहराव…
और फिर
एक ठोस टकराहट
नज़र नहीं आती,
पर महसूस होती है…
माथे के भीतर
एक तेज़-सी गूँज,
दिल के अंदर
एक अचानक-सा दरार…
ख़ून
सिर्फ़ बाहर नहीं बहता
कई बार
वो भीतर उतर जाता है…
ऐसे आईने
दिखते नहीं,
पर रोकते हैं
बिना बताए
तुम्हारी रफ़्तार तोड़ देते हैं…
मैं भी
कई बार टकराया हूँ उनसे
रिश्तों के बीच,
बातों के लहजे में,
अपनों की खामोशियों में…
जहाँ सब कुछ “सामान्य” था,
पर कुछ भी
सच नहीं था…
वो आईने
टूटते भी हैं
और जब टूटते हैं,
तो आवाज़ कम होती है
मगर चोट
गहरी…
क्योंकि
उनके टुकड़े
दिखते नहीं
वे भीतर धँस जाते हैं,
याद बनकर,
सवाल बनकर…
तब समझ आता है
हर चमक
रास्ता नहीं होती,
हर पारदर्शिता
सच नहीं होती…
कुछ चीज़ें
सिर्फ़ इसलिए साफ़ होती हैं
ताकि तुम
उनसे टकरा सको…
अब
मैं चलते हुए
थोड़ा ठहरता हूँ
हर “साफ़” चीज़ को
रास्ता नहीं मानता…
क्योंकि
जो दिखता नहीं
वो कभी-कभी
सबसे ज़्यादा तोड़ता है…
और अब
मैंने सीख लिया है
हर पारदर्शी सतह को
थोड़ा शक से देखना…
क्योंकि
हर आईना
चेहरा नहीं दिखाता
कुछ
बस तुम्हें
तोड़ने का इंतज़ार करते हैं…
जो दिखा ही नहीं—वही सबसे बड़ा फ़रेब था,
मैं रास्ता समझा—वो छुपा हुआ आईना था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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