हर आईना असली सूरत नहीं दिखाता
हर आईना
असली सूरत नहीं दिखाता
कुछ आईने
रोशनी के हिसाब से सच बदल देते हैं,
कुछ
हमारी ख्वाहिशों के मुताबिक़…
कहीं
कोण थोड़ा-सा बदलो
तो चेहरा “बेहतर” लगने लगता है
कहीं
बस एक मुस्कान जोड़ दो
तो पूरी कहानी छुप जाती है…
और हम
हम उसी आईने को चुन लेते हैं
जो हमें
कम तकलीफ़ दे…
मैंने भी
बरसों
ऐसे ही आईने चुने
जहाँ मैं थोड़ा अच्छा दिखूँ,
थोड़ा कम टूटा हुआ,
थोड़ा ज़्यादा क़ाबिल…
मगर
वो सब आईने
मेरे लिए नहीं थे
वो
मेरी “ज़रूरत” के लिए थे…
असल मैं
उनमें कहीं नहीं था…
फिर
एक दिन
मैंने आईनों से पूछना छोड़ दिया
“मैं कैसा हूँ?”
और
खुद से पूछ लिया
“मैं हूँ भी…
या बस
दिख रहा हूँ…?”
तभी समझ आया
आईना
कभी पूरा सच नहीं होता,
वो बस
एक कोण होता है
एक सीमित नज़र,
एक तय फ्रेम…
और जो “मैं” हूँ
वो किसी फ्रेम में
कैद नहीं होता…
वो
कभी हँसते चेहरे के पीछे है,
कभी
खामोश आँखों के भीतर…
कभी
टूटे हुए लम्हों में,
कभी
बेख़बर सांसों में…
और कई बार
वो कहीं भी नहीं दिखता…
क्योंकि
वो “दिखने” की चीज़ ही नहीं है…
मैंने
आईनों को छोड़ दिया
अब
मैं खुद को
देखने की कोशिश नहीं करता…
मैं बस
जीता हूँ
और उस जीने में
जो कुछ उभरता है
वही
मेरी सूरत है…
बिना फ्रेम,
बिना किनारे,
बिना किसी आईने के…
हर आईना मुझे मेरा नहीं दिखा पाया,
मैं जब खुद में उतरा—तब असल नज़र आया।*
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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