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Monday, 27 April 2026

आईने पे धूल

 आईने पे धूल


आईने पे धूल जमती है

धीरे-धीरे,

बिना आवाज़ के…


पहले

बस एक हल्की-सी परत होती है,

जिसे हम

उँगलियों से पोंछ देते हैं…


मगर

वक़्त के साथ

वो धूल

सिर्फ़ सतह पर नहीं रहती


वो आदत बन जाती है…


अब

हम आईना नहीं साफ़ करते,

हम धूल के साथ

देखना सीख लेते हैं…


चेहरा वही होता है

पर धुंधला…

थोड़ा नरम…

थोड़ा “सहने लायक”…


क्योंकि

साफ़ आईना

ज़्यादा सख़्त होता है


वो

कोई रियायत नहीं देता…


मैंने भी

कई बार

अपने आईनों पर

धूल जमने दी


कभी

अपने सच को मुलायम करने के लिए,

कभी

अपनी झूठी तस्वीर को

बचाने के लिए…


मगर

एक दिन

हवा कुछ ज़्यादा तेज़ चली


और सारी धूल

उड़ गई…


अचानक

आईना साफ़ था…


इतना साफ़

कि मैं

खुद से नज़रें नहीं मिला पाया…


क्योंकि

अब कोई परत नहीं थी

न बहाना,

न पर्दा…


सिर्फ़ एक नंगा सच


जिसे

मैं सालों से

धूल के नीचे

छुपाता आया था…


मैंने फिर

हाथ बढ़ाया

सोचा,

थोड़ी-सी धूल

वापस रख दूँ…


मगर

इस बार

उँगलियाँ रुक गईं…


शायद

अब थक गया था

खुद को “कम सच” दिखाने से…


शायद

अब सह सकता था

वो तीखापन

जो साफ़ आईना देता है…


मैंने आईने को

वैसा ही रहने दिया


बिना धूल,

बिना माफी…


और पहली बार

महसूस किया


कि साफ़ दिखना

हमेशा आसान नहीं होता,

मगर

वहीं से

असल देखना शुरू होता है…


बाकी सब

बस

धूल की मेहरबानी थी…


धूल ने आईने को रहमदिल बना रखा था,

साफ़ हुआ तो सच ने बेक़रार कर दिया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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