हर शख़्स आईने का बना है…
हर शख़्स आईने का बना है
और हर शख़्स
खुद को टूटने से बचाने की
ज़द्दो-ज़हद में लगा है…
कोई अपनी मुस्कान को
गोंद की तरह इस्तेमाल करता है,
ताकि दरारें दिखें नहीं
कोई खामोशी को ओढ़ लेता है,
जैसे आवाज़ ही
सबसे बड़ा ख़तरा हो…
हर तरफ़
सहेजे हुए चेहरे हैं
तराशे हुए,
चमकाए हुए,
बेहद नाज़ुक…
जैसे बस
एक सच की हल्की-सी ठोकर
और सब बिखर जाएगा…
मैं उन सबके बीच
खड़ा था
मगर अब
मैं खुद को नहीं बचा रहा था…
क्योंकि
जो टूटना था
वो पहले ही
टूट चुका था…
और जो बचा था
वो आईना नहीं था…
वो कुछ और था
कुछ ऐसा
जिसे दरारों से डर नहीं लगता…
मैंने देखा
लोग अपने-अपने “सच” को
सजाकर रखते हैं
जैसे कोई नाज़ुक शो-पीस हो,
जिसे गिरने नहीं देना है…
मगर सच
सच तो गिरता है…
टूटता है…
और फिर भी
ज़िंदा रहता है…
क्योंकि
सच का होना
उसके “सही दिखने” पर निर्भर नहीं करता…
मैंने एक आदमी को देखा
वो बार-बार
अपने चेहरे को
आईने में ठीक कर रहा था…
उसकी आँखों में
एक अजीब-सी दहशत थी—
जैसे उसे पता हो,
कि एक दिन
आईना
उससे झूठ बोलना बंद कर देगा…
और उस दिन—
वो खुद को पहचान नहीं पाएगा…
मैं आगे बढ़ गया—
अब मुझे किसी को
सच बताने की जल्दी नहीं थी…
क्योंकि
सच कभी कहा नहीं जाता,
वो बस
टूटकर
दिख जाता है…
और जो देखने की हिम्मत रखता है
वही उसे
सह पाता है…
बाकी सब
बस
आईनों को बचाते रहते हैं…
खुद को नहीं…
हर शख़्स दरारों को छुपाने में लगा है,
आईना ही है—जो सच बताने में लगा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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