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Sunday, 26 April 2026

वापसी का वक़्त

 वापसी का वक़्त

मैं लौट रहा था

मगर इस बार

कोई रास्ता मुझे नहीं पहचानता था…


शहर वही था,

गलियाँ वही,

चेहरे भी शायद वही


मगर

मेरे भीतर जो कुछ टूटकर बिखरा था,

उसकी किरचें अब

किसी आईने में फिट नहीं बैठती थीं…


मैं भीड़ के बीच से गुज़रा

लोग अब भी

अपने-अपने चेहरों को सँभाले हुए थे,

जैसे कोई क़ीमती नक़ाब हो

जिसे गिरने नहीं देना है…


मुझे उनमें

अपना पुराना “मैं” दिखा

वो जो हर वक़्त

किसी आईने की तलाश में रहता था…


मैं ठहरा नहीं

क्योंकि अब

मुझे खुद को देखने की

भूख नहीं रही…


अब देखने से ज़्यादा

मैं “देख रहा था”…


एक आदमी हँस रहा था

उसकी हँसी में

डर की बासी गंध थी…


एक औरत

बहुत सलीके से चल रही थी

जैसे हर क़दम पर

वो अपने टूटने को छुपा रही हो…


एक बच्चा

आईने में मुँह बनाकर

खुद को बदलने की कोशिश कर रहा था


और मैं

मैं बस गुज़र रहा था…


बिना किसी फ़ैसले के,

बिना किसी पहचान के…


पहले

मैं हर चेहरे में

अपने लिए कोई मतलब ढूँढता था


अब हर चेहरा

अपने आप में पूरा था,

और मैं

उनसे खाली…


ये खालीपन

अब चुभता नहीं था


ये काटता था…

तेज़,

साफ़,

बिना रहम के…


मगर उसी काट में

एक अजीब-सी आज़ादी थी


जैसे

हर झूठ का मांस

धीरे-धीरे उतर रहा हो

और नीचे

नंगा सच

साँस ले रहा हो…


मैंने महसूस किया


सच

कभी मुलायम नहीं होता,

वो हमेशा

थोड़ा बेरहम होता है…


क्योंकि

वो किसी भी “सुंदर झूठ” को

ज़िंदा नहीं छोड़ता…


मैं चलता रहा


अब कोई आवाज़

मुझे बुलाती नहीं थी,

कोई आईना

मुझे रोकता नहीं था…


बस एक अजीब-सी

सीधी रेखा थी


जिस पर मैं

बिना मुड़े

बढ़ता जा रहा था…


शायद

यही “वापसी” थी


जहाँ

कुछ भी पीछे नहीं छूटता,

और कुछ भी

साथ नहीं लिया जाता…


बस

तू

अपने ही आर-पार

गुज़र जाता है…


चेहरों के मेले में खुद को गँवा कर आया हूँ,

अब जो भी हूँ—बिना नक़ाब, कच्चा सा आया हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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