पीपल तले टँगी दो मटियाएँ — शुद्धि तक का लोक-रहस्य
(एक शोधात्मक, रहस्यमय नज़्म)
उत्तर भारत के अनेक गाँवों में
श्मशान से लौटती भीड़ के साथ
एक अदृश्य परंपरा भी चलती है
पीपल के तने पर
मिट्टी की दो मटियाएँ टाँग दी जाती हैं।
एक में जल,
दूसरी में जलता हुआ दीप।
कहते हैं
जब तक शुद्धि न हो,
आत्मा यहाँ आती है,
प्यास बुझाती है,
और रोशनी में अपना रास्ता पहचानती है।
यह विश्वास है
पर क्या केवल विश्वास?
पीपल
जिसे शास्त्रों ने देव-वृक्ष कहा,
जिसकी पत्तियाँ
रात के सन्नाटे में भी काँपती रहती हैं,
मानो श्वास लेती हों।
वनस्पति-विज्ञान बताता है
उसकी संरचना ऐसी है
कि वायु-संचार निरंतर बना रहता है।
लोक-मन कहता है
वह जीवितों और मृतकों के बीच
एक सेतु है।
दाह संस्कार के बाद
जब शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है,
तो प्रश्न बचता है
क्या चेतना भी तत्क्षण मुक्त हो जाती है?
या वह कुछ समय
अपनी ही स्मृतियों के इर्द-गिर्द भटकती है?
इन दो मटियाओं में
जल और दीप
केवल वस्तुएँ नहीं
वे प्रतीक हैं।
जल
जीवन का तत्त्व,
शांतिदायक, शीतल,
प्यास का उत्तर।
दीप
अग्नि का सूक्ष्म रूप,
दिशा का संकेत,
अँधेरे में चेतना की लौ।
शोध कहता है
शोकग्रस्त परिवार
एक अनुष्ठान के माध्यम से
अपनी असहायता को
अर्थ देता है।
मनोविज्ञान बताता है
यह प्रतीकात्मक क्रिया
विरह को सहने की प्रक्रिया है।
पर लोक-आस्था कहती है—
रात के तीसरे पहर
जब हवा पीपल की पत्तियों को हिलाती है
और दीप की लौ काँपती है,
तो वह केवल वायु नहीं,
आगंतुक आत्मा की आहट है।
कभी-कभी
जल की सतह पर
एक हल्की-सी कंपन दिखाई देती है—
लोग कहते हैं,
“वो आए थे।”
क्या यह मन की तरंग है?
या सचमुच कोई अदृश्य उपस्थिति?
पीपल का तना
मौन गवाह है
कितनी पीढ़ियों के बिछोह का,
कितने नाम
जो अब स्मृति में भी धुँधले हैं।
हर मटिया
कुछ दिन बाद
सूख जाती है;
दीप की लौ
बुझ जाती है;
शुद्धि का दिन आता है
और उन्हें उतार लिया जाता है।
पर प्रश्न
अब भी तने से लटका रहता है
क्या आत्मा सचमुच
पानी पीने आती है?
या यह जीवितों का मन है
जो मृतक की प्यास
अपने भीतर महसूस करता है?
दीप की लौ
क्या सचमुच दिशा दिखाती है?
या यह हमारे भीतर का भय है
जो अँधेरे को स्वीकार नहीं कर पाता?
फिर भी
जब संध्या उतरती है,
और पीपल की छाया लंबी हो जाती है,
तो उन मटियाओं में
एक अजीब-सी गरिमा होती है।
वे मानो कहती हैं—
मृत्यु अंत नहीं,
एक संक्रमण है;
और इस संक्रमण के बीच
जल और प्रकाश
मानवता की अंतिम भेंट हैं।
शुद्धि तक
आत्मा आए या न आए
पर इन दिनों में
परिवार रोज़ उस वृक्ष के पास जाता है,
दीप में तेल डालता है,
जल बदलता है,
और मृतक से
एक अदृश्य संवाद बनाए रखता है।
शायद यही इस परंपरा का गूढ़ अर्थ है—
मृत्यु को अचानक न मानना,
उसे धीरे-धीरे स्वीकार करना;
आत्मा को नहीं,
अपने शोक को
जल और प्रकाश देना।
पीपल खड़ा रहता है
धरती में जड़ें,
आकाश में पत्तियाँ,
और बीच में लटकती दो मटियाएँ
मानव विश्वास का दस्तावेज़।
जब हवा चलती है,
दीप काँपता है,
जल हिलता है—
तो लगता है
जीवन और मृत्यु के बीच
एक सूक्ष्म संवाद जारी है।
और शायद
रहस्य इस बात में नहीं
कि आत्मा आती है या नहीं—
रहस्य इस बात में है
कि मनुष्य
विरह को भी
एक अनुष्ठान में बदल देता है,
ताकि अँधेरे में
कम-से-कम एक दीप
जलता रहे।
मुकेश ,,,,,
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