केनोपनिषद् — सम्बन्ध-भाष्य (वाक्य-भाष्य)
(६) आत्मा की नित्य-अविकारी प्रकृति एवं कर्म-अनुपपत्ति
मूल संस्कृत पाठ*
विचिकारयिषितः, आत्मत्वे सति नित्यत्वादविकारित्वादविषयत्वादमूर्तत्वाच्च । श्रुतेश्च “न वर्धते कर्मणा" इत्यादि । स्मृतेश्च “अविकार्योऽयमुच्यते" इति । न च संचिकीर्षितः । “शुद्धमपापविद्धम्” इत्यादि श्रुतिभ्यः । अनन्यत्वाच्च । अन्येनान्यत्संस्क्रियते न चात्मनोऽन्यभूता क्रियाऽस्ति, न च स्वेनैवात्मना स्वमात्मानं संचिकर्षेत् । न च वस्त्वन्तराधानं, नित्यं प्राप्तिर्वा वस्त्वन्तरस्य नित्या । नित्यत्वं चेष्टं मोक्षस्य । अत उत्पन्नविद्यस्य कर्मारम्भोऽनुपपन्नः। अतो व्यावृत्तबाह्यबुद्धेरात्मविज्ञानाय “केनेषितम्…” इत्याद्यारम्भः ॥
1. सरल हिन्दी रूपान्तरण
आत्मा को किसी प्रकार बदलने, सुधारने या बनाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह सदा से ही नित्य (अपरिवर्तनशील), अविकारी (जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता), इन्द्रियों से परे और निराकार है। श्रुति और स्मृति दोनों ही बताती हैं कि आत्मा कर्म से न तो बढ़ता है और न बदलता है।
आत्मा को शुद्ध करने की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह पहले से ही शुद्ध और पापरहित है।
किसी वस्तु में परिवर्तन तभी होता है जब कोई दूसरी वस्तु उस पर क्रिया करे। लेकिन आत्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी सत्ता नहीं है, और आत्मा स्वयं भी अपने ऊपर क्रिया नहीं कर सकता।
आत्मा में कुछ नया जोड़ा नहीं जा सकता और न ही वह कुछ नया प्राप्त करता है, क्योंकि वह सदा से ही पूर्ण है। मोक्ष भी इसी नित्य स्वरूप की पहचान है।
इसलिए जिस व्यक्ति को आत्मज्ञान हो चुका है, उसके लिए कर्म करना तर्कसंगत नहीं है।
इसी कारण, जो साधक बाहरी विषयों से बुद्धि हटाकर आत्मा को जानना चाहता है, उसके लिए “केनेषितम्…” से यह अध्याय आरम्भ होता है।
2. दार्शनिक विश्लेषण (Research-level)
(A) विषय-निर्धारण
यह अंश निम्न सिद्धान्तों को स्थापित करता है:
आत्मा की नित्य एवं अविकारी प्रकृति
आत्मा का असंस्कार्य (जिसमें परिवर्तन न हो सके) होना
ज्ञानोत्तर कर्म की असंगति
मन्त्र-भाष्य की भूमिका
(B) आत्मा का स्वरूप
नित्यत्व → सदा एक समान
अविकारित्व → परिवर्तनरहित
अविषयत्व → इन्द्रियातीत
अमूर्तत्व → निराकार
आत्मा किसी क्रिया या परिवर्तन का विषय नहीं है।
(C) श्रुति–स्मृति प्रमाण
“न वर्धते कर्मणा” → कर्म आत्मा को प्रभावित नहीं करता
“अविकार्योऽयम्” → आत्मा अपरिवर्तनीय है
(D) “शुद्धमपापविद्धम्”
आत्मा नित्य शुद्ध है
पाप का उसमें स्पर्श नहीं
अतः शुद्धि-साधन (कर्म) आत्मा पर लागू नहीं होते
(E) अनन्यत्व (अद्वैत)
आत्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा तत्त्व नहीं
परिणाम :
कोई “दूसरा” नहीं जो आत्मा को बदले
आत्मा स्वयं भी अपने को परिवर्तित नहीं कर सकता
(F) क्रिया की असम्भवता
क्रिया के लिए कर्ता–कर्म–करण भेद आवश्यक
आत्मा अद्वैत है
इसलिए आत्मा में क्रिया असम्भव
(G) “वस्त्वन्तराधान” का अभाव
आत्मा में कुछ जोड़ा नहीं जा सकता
न ही कुछ नया प्राप्त करना है
क्योंकि वह नित्य-सिद्ध (पहले से प्राप्त) है
(H) मोक्ष का स्वरूप
मोक्ष = आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान
कोई नई उपलब्धि नहीं
“नित्याप्तत्व” का सिद्धान्त
(I) ज्ञानोत्तर कर्म-अनुपपत्ति
“उत्पन्नविद्यस्य कर्मारम्भः अनुपपन्नः”
ज्ञान के बाद कर्म का कोई प्रयोजन नहीं
(J) मन्त्र-भाष्य की भूमिका
“व्यावृत्त-बाह्य-बुद्धि” → मन को विषयों से हटाना
“केनेषितम्…” → आत्म-जिज्ञासा का प्रारम्भ
3. निष्कर्ष
यह अंश स्पष्ट करता है:
आत्मा नित्य, शुद्ध और अविकारी है
उसमें कोई परिवर्तन सम्भव नहीं
ज्ञान के बाद कर्म का कोई स्थान नहीं
अब साधक को आत्मा की जिज्ञासा की ओर प्रवृत्त होना चाहिए
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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