होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Saturday, 25 April 2026

केनोपनिषद् — सम्बन्ध-भाष्य (शंकराचार्य )

 केनोपनिषद् — सम्बन्ध-भाष्य  (शंकराचार्य )

(A) समस्त संस्कृत पाठ 

समाप्तं कर्मात्मभूतप्राणविषयं विज्ञानं कर्म चानेकप्रकारम्‌ । ययोर्विकल्पसमुच्चयानुष्ठानादक्षिणोत्तराभ्यां सृतिभ्यामावृत्त्यनावृत्ती भवतः । अत ऊर्ध्वं फलनिरपेक्षज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानात्कृतात्मसंस्कारस्योच्छिन्नात्मज्ञानप्रतिबन्धकस्य द्वैतविषयदोषदर्शिनो निर्ज्ञाताशेषबाह्यविषयत्वात्संसारबीजमज्ञानमुच्छिच्छित्सतः…

विषयजिज्ञासोः केनेषितमित्यात्मस्वरूपतत्त्वविज्ञानायायमध्याय आरभ्यते । तेन च मृत्युपदमज्ञानमुच्छेत्तव्यं तत्तन्त्रो हि संसारः । अनधिगतत्वादात्मनो युक्ता तदधिगमाय तद्विषया जिज्ञासा । कर्मविषये चानुक्तिः तद्विरोधित्वात्‌…

ब्रह्म मन्यमानः प्रवृत्तिं प्रयोजनवती पश्यति । न च निष्प्रयोजना प्रवृत्तिरतः विरुध्यत एव कर्मणा ज्ञानम्‌ । अतः कर्मविषयेऽनुक्तिः । निष्कामस्य संस्कारार्थत्वात्‌…

कर्माणि भवन्ति तन्निर्वर्तक-आश्रय-प्राणविज्ञानसहितानि… संस्कारार्थमेव कर्माणि… प्राणादिविज्ञानं सकामस्य प्राप्यर्थमेव भवति, निष्कामस्य त्वात्मज्ञानप्रतिबन्धनिर्मार्जने…

आदर्शनिर्मार्जनवत्‌ । उत्पन्नात्मविद्यस्य त्वनारम्भः… कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते… त्यागेनैके… नान्यः पन्था विद्यते… ज्ञानेन अमृतत्वप्राप्तिः…

विचिकारयिषितः, आत्मत्वे सति नित्यत्वादविकारित्वादविषयत्वादमूर्तत्वाच्च… न वर्धते कर्मणा… अविकार्योऽयम्… शुद्धमपापविद्धम्… अनन्यत्वात्… उत्पन्नविद्यस्य कर्मारम्भोऽनुपपन्नः… अतो व्यावृत्तबाह्यबुद्धेरात्मविज्ञानाय केनेषितमित्याद्यारम्भः ॥

(B) समस्त हिन्दी रूपान्तरण (संगठित)

वेद में वर्णित कर्म और प्राण-सम्बन्धी उपासना—इन दोनों के विभिन्न रूपों का अनुष्ठान करने से जीव दक्षिण और उत्तर मार्गों के द्वारा जन्म-मरण के चक्र में आता-जाता रहता है। परन्तु जब मनुष्य फल की इच्छा छोड़कर कर्म और उपासना करता है, तब उसका अन्तःकरण शुद्ध होता है और वह धीरे-धीरे बाह्य विषयों से विरक्त होकर अज्ञान के नाश की ओर बढ़ता है।

इसी अज्ञान के नाश के लिए “केनेषितम्…” से यह अध्याय आरम्भ होता है। आत्मा अभी अज्ञात है, इसलिए उसे जानने की जिज्ञासा उचित है। यहाँ कर्म का वर्णन नहीं किया गया है, क्योंकि कर्म आत्मज्ञान के विपरीत है।

हर कर्म किसी न किसी उद्देश्य से किया जाता है, जबकि आत्मज्ञान पूर्णता का बोध कराता है। इस कारण ज्ञान और कर्म स्वभावतः विरोधी हैं। फिर भी प्रारम्भिक अवस्था में निष्काम कर्म आवश्यक है, क्योंकि वह मन की शुद्धि करता है।

वैदिक कर्म प्राण-उपासना के साथ जुड़े होते हैं और उनका वास्तविक उद्देश्य संस्कार (अन्तःकरण-शुद्धि) है। सकाम भाव से किया गया कर्म बन्धन का कारण है, जबकि निष्काम कर्म आत्मज्ञान में बाधाओं को दूर करता है।

जब आत्मज्ञान उत्पन्न हो जाता है, तब कर्म का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। जैसे दर्पण को साफ करने के बाद उसे बार-बार पोंछने की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही ज्ञान प्राप्त होने पर कर्म त्याज्य हो जाता है। श्रुति भी कहती है कि कर्म से बन्धन और ज्ञान से मुक्ति होती है।

आत्मा स्वभाव से ही नित्य, शुद्ध, अविकारी, निराकार और इन्द्रियातीत है। उसमें कोई परिवर्तन सम्भव नहीं है और न ही उसमें कुछ जोड़ा या घटाया जा सकता है। इसलिए वह किसी कर्म का विषय नहीं बन सकता।

मोक्ष कोई नई वस्तु की प्राप्ति नहीं है, बल्कि उसी नित्य आत्मस्वरूप का ज्ञान है जो सदा से विद्यमान है। इस कारण, आत्मज्ञान होने के बाद कर्म का आरम्भ करना अनुचित है।

अतः जो साधक बाह्य विषयों से बुद्धि हटाकर आत्मा को जानना चाहता है, उसके लिए “केनेषितम्…” से आत्मजिज्ञासा का यह उपनिषद् आरम्भ होता है।

(C) सम्बन्ध-भाष्य का सार (Summary)

सम्बन्ध-भाष्य का मुख्य उद्देश्य यह स्थापित करना है कि:

अज्ञान ही संसार का मूल कारण है

कर्म और उपासना केवल साधन हैं, वे स्वयं मोक्ष नहीं देते

निष्काम कर्म → चित्तशुद्धि → ज्ञान की तैयारी

ज्ञान और कर्म अन्ततः विरोधी हैं

आत्मज्ञान ही मोक्ष का एकमात्र कारण है

आत्मा नित्य, शुद्ध, अविकारी और स्वतःसिद्ध है

ज्ञान के बाद कर्म का त्याग स्वाभाविक और आवश्यक है


अन्ततः यह भाष्य एक स्पष्ट मार्ग दिखाता है:

कर्म → निष्काम कर्म → चित्तशुद्धि → आत्मजिज्ञासा → आत्मज्ञान → अज्ञान-नाश → मोक्ष

(सम्बन्ध-भाष्य समाप्त — अब मन्त्र-भाष्य आरम्भ)

मुकेश ,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment