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Monday, 20 April 2026

सत्यधर्माय— तव सत्यस्य उपासनात्, सत्यं धर्मः यस्य मम सः अहम् सत्यधर्मा; तस्मात् मम इदम्।

 सत्यधर्माय— तव सत्यस्य उपासनात्, सत्यं धर्मः यस्य मम सः अहम् सत्यधर्मा; तस्मात् मम इदम्।

अथवा— यथाभूतस्य धर्मस्य अनुष्ठात्रे।

दृष्टये— तव सत्यात्मनः उपलम्भाय॥१५॥



हे पूषन्! तव सत्यस्य उपासनात्, यः अहं सत्यं धर्मं यस्य सः (सत्यधर्मा) अस्मि, तस्मात् मम (इदं आवरणम्) अपसारय।

अथवा— यथाभूत धर्म का अनुष्ठान करने वाले (मुझ) के लिए, तेरे सत्यात्मा के दर्शन हेतु (इसे हटा)।


हे पूषन्! मैं तेरे सत्यस्वरूप की उपासना करने वाला “सत्यधर्मा” हूँ (अर्थात् सत्याचरण करने वाला हूँ), इसलिए मेरे लिए उस सत्य के दर्शन के उद्देश्य से इस आवरण को हटा दो।



यहाँ साधक अपने को “सत्यधर्मा” कहकर प्रस्तुत करता है—

अर्थात् वह जो सत्य के अनुरूप आचरण करता है और सत्य की उपासना करता है।


इस आधार पर वह प्रार्थना करता है कि—

“मैं पात्र हूँ, इसलिए मुझे सत्य का दर्शन कराया जाए।”


“दृष्टये” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है—

यह केवल देखना नहीं, बल्कि सत्य का साक्षात्कार है।


संक्षेप में—

साधना (उपासना + सत्याचरण) से पात्रता बनती है,

और उसी पात्रता के आधार पर साधक सत्य-दर्शन की याचना करता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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