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Monday, 20 April 2026

मुखं द्वारम्” का अर्थ है— सत्य तक पहुँचने का प्रत्यक्ष प्रवेश-बिंदु, जो सामने होते हुए भी ढका हुआ है।

 “मुखं द्वारं तत्त्वं हे पूषन् अपावृणु—अपसारय”


यहाँ साधक सूर्य (पूषन्) से प्रार्थना करता है—

 “हे प्रकाशदाता! सत्य (तत्त्व) के मुखरूप द्वार को खोल दो, उसके ऊपर जो आवरण है उसे हटा दो।”


मुखं द्वारम्” का अर्थ है— सत्य तक पहुँचने का प्रत्यक्ष प्रवेश-बिंदु, जो सामने होते हुए भी ढका हुआ है।

“अपावृणु” और “अपसारय” — दोनों शब्द मिलकर यह सूचित करते हैं कि कोई आवरण है जिसे हटाना आवश्यक है।


संक्षेप में—

सत्य दूर नहीं है,

परन्तु एक सूक्ष्म आच्छादन के कारण अप्रकट है,

और साधक उस आवरण को हटाने की याचना कर रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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