“सत्यस्य… आदित्यमण्डलस्थस्य ब्रह्मणः अपिहितम्…” — आवरण और ब्रह्म-दर्शन का निबंधात्मक विवेचन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
सत्यस्य— आदित्य-मण्डल-स्थस्य ब्रह्मणः;
अपिहितम्— आच्छादितम्॥
ईशावास्योपनिषद् के पन्द्रहवें मन्त्र के इस संक्षिप्त किन्तु गूढ़ पदांश में उस सत्य की स्थिति और उस पर पड़े आवरण का वर्णन है, जिसकी ओर साधक अपनी अंतिम प्रार्थना में उन्मुख होता है। आदि शंकराचार्य इस पद का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि यहाँ “सत्य” से अभिप्राय उस ब्रह्म से है, जो आदित्य-मण्डल में उपास्य रूप से स्थित माना गया है—किन्तु वह एक आवरण से ढका हुआ है।
“सत्यस्य” — परम तत्त्व का निर्देश
यहाँ “सत्य” शब्द का अर्थ है—
नित्य, अविनाशी तत्त्व
ब्रह्म, जो कभी परिवर्तित नहीं होता
समस्त अनुभवों का आधार
अतः—
यह सामान्य सत्य नहीं,
बल्कि परम सत्य (ब्रह्म) है
“आदित्य-मण्डल-स्थस्य ब्रह्मणः” — उपास्य ब्रह्म
शंकराचार्य के अनुसार—
यह ब्रह्म “आदित्य-मण्डल” में स्थित कहा गया है
यहाँ इसका अर्थ भौतिक स्थान नहीं, बल्कि—
उपासना का एक प्रतीक
ध्यान का एक केन्द्र
अर्थात्—
साधक सूर्य को माध्यम बनाकर
उस ब्रह्म का ध्यान करता है
“अपिहितम्— आच्छादितम्” — आवरण की स्थिति
यहाँ मुख्य बिन्दु है—
वह ब्रह्म आच्छादित (ढका हुआ) है
किससे?
“हिरण्मयेन पात्रेण” (स्वर्णमय आवरण से)
यह आवरण—
ज्योतिर्मय है
आकर्षक है
परन्तु सत्य को ढँक देता है
दार्शनिक अर्थ
यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म संकेत है—
सत्य अपने आप में कभी छिपा नहीं होता,
परन्तु—
साधक की दृष्टि पर आवरण होता है
अतः—
ब्रह्म सदैव प्रकट है
किन्तु हम उसे नहीं देख पाते
आवरण का स्वरूप
यह “आवरण” क्या है?
दार्शनिक दृष्टि से—
इन्द्रियजन्य अनुभव
नाम–रूप का जगत्
उपासना से प्राप्त तेज
सूक्ष्म अहंकार
ये सब—
सत्य को ढँकने वाले “पात्र” हैं
उपासना से ज्ञान की ओर
यह पद यह भी दर्शाता है कि—
साधक अब उपासना के उच्च स्तर पर पहुँच चुका है
वह ब्रह्म के समीप है
किन्तु—
अंतिम आवरण अभी भी शेष है
इसलिए—
वह प्रार्थना करता है—
“इसे हटा दो”
दृष्टांत
जैसे—
स्वर्ण के चमकदार पात्र के भीतर कोई रत्न छिपा हो,
और उसकी चमक ही हमारी दृष्टि को बाँध ले—
उसी प्रकार—
यह ज्योतिर्मय जगत्
ब्रह्म को ढँक देता है
इस शांकरभाष्यांश में आदि शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि—
आदित्य-मण्डल में उपास्य ब्रह्म,
एक “हिरण्मय आवरण” से आच्छादित है।
साधक का लक्ष्य है—
उस आवरण को हटाकर
उस सत्य का साक्षात्कार करना,
जो सदैव उपस्थित होते हुए भी
दृष्टि के भ्रम के कारण अप्रकट प्रतीत होता है।
यही—
उपासना से ज्ञान की अंतिम यात्रा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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