धूल भरी किताब
1
धूल भरी किताब
शेल्फ़ के कोने में पड़ी है,
जैसे कोई आवाज़
बरसों से दबाई गई हो।
2
उसके पन्नों पर
समय जम गया है,
हर शब्द
धीरे-धीरे ढक गया है।
3
कभी कोई
इसे खोलता था,
अब उँगलियाँ
बस धूल लिखती हैं।
4
पहला पन्ना पलटो,
तो एक गंध उठती है
जैसे बीते दिनों
फिर से लौट आए हों।
5
कुछ पन्ने मुड़े हुए हैं,
जहाँ किसी ने
खुद को रोका था।
6
अंदर लिखी बातें
अब भी ताज़ा हैं,
बस पढ़ने वाली आँखें
थोड़ी दूर हो गई हैं।
7
कवर फीका पड़ गया है,
पर भीतर
अब भी रंग बाकी है।
8
वो चुप है,
पर हर पन्ना
कुछ कहना चाहता है।
9
एक दिन
कोई फिर से खोलेगा,
और ये धूल
कहानी बन जाएगी।
10
धूल भरी किताब
भूले हुए लफ़्ज़ों का घर,
जो इंतज़ार में
अब भी खुला है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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