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Friday, 10 April 2026

मैं—एक गिलहरी

 मैं—एक गिलहरी।

छोटी-सी, चंचल-सी,

पर मेरी कहानी

केवल फुर्ती नहीं,

विज्ञान की बारीकियों में भी दर्ज है।


मेरे शरीर की ये तीन धारियाँ

कोई अलंकार नहीं,

ये पहचान हैं मेरी प्रजाति की,

जैसे किसी शोधपत्र में लिखा गया

एक स्थायी निष्कर्ष।


मैं पेड़ों पर दौड़ती हूँ,

पर ये सिर्फ़ खेल नहीं

ये “अनुकूलन” (adaptation) है,

मेरे पंजों की पकड़,

मेरी पूँछ का संतुलन,

सब प्रकृति की प्रयोगशाला में सिद्ध हुआ है।


तुम्हें लगता है,

मैं बस दाने इकट्ठा करती हूँ

पर ये संग्रह नहीं,

“भविष्य-नियोजन” (future planning) है,

जहाँ हर छुपाया हुआ बीज

एक संभावना है

या तो भोजन,

या एक नया पेड़।


हाँ,

मैं अनजाने में जंगल उगाती हूँ।


मेरी याददाश्त पर भी

कई अध्ययन हुए हैं

मैं सब याद नहीं रख पाती,

पर जो भूल जाती हूँ,

वही धरती याद रख लेती है।


इस तरह,

मेरी भूल भी

पर्यावरण का योगदान बन जाती है।


मैं छोटी हूँ,

पर मेरा डर बड़ा है

हर पल सतर्क रहना पड़ता है,

क्योंकि शिकारी केवल जंगल में नहीं,

अब शहरों में भी हैं।


तुम्हारी दुनिया

मेरे लिए आसान नहीं रही

पेड़ कम हुए,

दीवारें बढ़ीं,

पर मैंने खुद को ढाला

अब मैं तारों पर भी दौड़ लेती हूँ,

छतों को भी जंगल बना लेती हूँ।


मेरी भाषा

तुम्हें “चिक-चिक” लगती है,

पर वह संचार है

खतरे का संकेत,

या साथी को पुकार।


मैं खेलती भी हूँ,

कूदती भी हूँ

पर हर हरकत में

जीवविज्ञान का संतुलन छिपा है।


कभी ध्यान से देखना

मैं जब रुकती हूँ,

तो स्थिर नहीं होती,

मैं “निरीक्षण” (observation) कर रही होती हूँ,

चारों ओर की हर हलचल को पढ़ती हुई।


मैं गिलहरी हूँ

न तो जंगल की रानी,

न शहर की मालिक

पर दोनों के बीच

एक सेतु जरूर हूँ।


मेरी कहानी

न तो सिर्फ़ प्यारी है,

न ही केवल साधारण


यह एक जीवित शोध है,

जहाँ हर छलाँग

एक निष्कर्ष है,

और हर डर

एक परिकल्पना।


अगर तुम सच में समझना चाहो,

तो मुझे केवल देखना मत

मुझे “पढ़ना”…


क्योंकि मैं

एक छोटी-सी गिलहरी नहीं,

प्रकृति की चलती-फिरती

एक शोध-पत्र हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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