पुरुष का प्रेम झरने की तरह होता है
अचानक, तीव्र, और पूरे अस्तित्व के साथ गिर पड़ने वाला।
वह शुरुआत में धीमा नहीं होता,
वह ठहर-ठहर कर बोलना नहीं जानता
जब प्रेम करता है,
तो सीधे ऊँचाइयों से कूद पड़ता है,
बिना यह सोचे कि नीचे कितनी गहराई है।
उसके प्रेम में शब्द कम होते हैं,
पर प्रवाह बहुत होता है।
वह “कहता” कम है,
“बहता” ज़्यादा है।
वह हर पल खुद को तोड़ता है
अपनी जिद, अपना अहं, अपनी खामोशी…
और उन्हीं टुकड़ों को
प्रेम की बूँदों में बदल देता है।
पर लोग अक्सर उसके शोर को ही सुनते हैं,
उसकी गहराई नहीं समझते।
जैसे झरना
ऊपर से देखने पर बस गिरता हुआ पानी लगता है,
पर उसके भीतर
पहाड़ की पूरी कहानी बह रही होती है।
पुरुष का प्रेम भी ऐसा ही है
वह सीधे इज़हार नहीं करता,
पर हर गिरावट में, हर कोशिश में,
वह अपना सब कुछ सौंप देता है।
कभी-कभी वह कठोर भी लगता है
पत्थरों से टकराता हुआ,
आवाज़ करता हुआ…
पर वही टकराहट
उसे संगीत देती है।
और जब उसका प्रेम सच्चा होता है,
तो उसकी बूँदों में भी इंद्रधनुष दिखता है
बस देखने वाली नज़र चाहिए।
पर एक सच्चाई और है
झरना हमेशा झरना नहीं रहता…
वह आगे चलकर नदी बन जाता है।
ठीक वैसे ही,
पुरुष का प्रेम भी
समय के साथ शांत, गहरा और विस्तृत हो जाता है।
शुरुआत में वह झरने की तरह होता है
उन्मुक्त, बेकाबू, और पूरी तरह समर्पित।
और अगर वह टिक गया,
तो वही प्रेम
नदी बनकर जीवन भर साथ बहता है।
क्योंकि
पुरुष का प्रेम दिखता कम है,
पर जब होता है,
तो पूरे अस्तित्व के साथ होता है…
एक झरने की तरह
जो गिरता भी है,
और जीवन भी देता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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