झरने की आत्मकथा -(एक अनसुनी आवाज़ की कहानी)
मैं—एक झरना।
हाँ, वही… जिसे लोग बस कुछ पल देखते हैं, तस्वीरों में कैद करते हैं,
और फिर आगे बढ़ जाते हैं
जैसे मैं कोई ठहराव नहीं, बस रास्ते की एक झलक हूँ।
नदियों की बातें बहुत होती हैं
उनकी विशालता, उनका प्रवाह, उनका संगम…
पर मैं?
मैं तो बस उनकी शुरुआत हूँ,
एक अनसुना आरंभ, जिसे कोई अंत तक नहीं पढ़ता।
मेरा जन्म शोर में नहीं,
एक खामोश रिसाव में होता है
पहाड़ के सीने में कहीं,
जहाँ बर्फ पिघलती है, या कोई बूंद रास्ता खोज लेती है।
धीरे-धीरे मैं फिसलता हूँ,
पत्थरों को टटोलता, दरारों से गुजरता
और फिर एक दिन अचानक
मैं गिर पड़ता हूँ…
पूरा का पूरा,
आकाश से धरती की ओर।
लोग कहते हैं
“देखो, कितना सुंदर झरना है!”
कोई नहीं पूछता
इस गिरने में कितना साहस लगता है।
मैं हर पल टूटता हूँ,
हर पल बिखरता हूँ
पर फिर भी हर बार
उसी पूरेपन के साथ गिरता हूँ।
मेरा संगीत तुम्हें मधुर लगता है,
पर ये मेरी टकराहटों की आवाज़ है
पत्थरों से, हवाओं से,
और कभी-कभी अपने ही डर से।
मैं रुकना चाहता हूँ कभी-कभी…
किसी चट्टान से लिपटकर ठहर जाना चाहता हूँ,
पर मेरी प्रकृति में ठहराव नहीं लिखा।
मैं बना ही हूँ बहने और गिरने के लिए।
मुझे देखकर लोग सुकून पाते हैं,
पर कोई ये नहीं समझता
कि मैं खुद कभी सुकून में नहीं होता।
फिर भी, मैं शिकायत नहीं करता
क्योंकि मैं जानता हूँ,
मेरे बिना नदियाँ अधूरी हैं।
मैं ही तो वो पहला साहस हूँ,
जो गिरकर भी बहना सिखाता है।
कभी-कभी जब सूरज मेरी बूँदों से खेलता है,
तो इंद्रधनुष बन जाता है
लोग उसे देख खुश हो जाते हैं।
मुझे अच्छा लगता है…
कम से कम उस पल,
मेरी टूटन में भी कोई रंग देख लेता है।
पर जब शाम ढलती है,
और लोग लौट जाते हैं,
तब मैं फिर अकेला रह जाता हूँ
अपने शोर के साथ,
अपनी अनकही कहानी के साथ।
मैं झरना हूँ
नदी की शुरुआत,
पर खुद एक अधूरी दास्तान।
अगर कभी तुम सच में सुनना चाहो,
तो मेरे पास बैठना
मेरे शोर को ध्यान से सुनना…
शायद तुम्हें उसमें
किसी गिरते हुए दिल की आवाज़ सुनाई दे,
जो हर बार टूटकर भी
बहना नहीं छोड़ता।
मुकेश ,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment