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Friday, 10 April 2026

पहाड़ की आत्मकथा

 पहाड़ की आत्मकथा

मैं—एक पहाड़।

स्थिर दिखता हूँ, पर भीतर अनगिनत हलचलें समेटे हुए।

लोग मुझे चुप समझते हैं, पर मेरी खामोशी में सदियों की कथाएँ गूँजती हैं।

मेरा जन्म किसी एक दिन नहीं हुआ था। मैं समय की लंबी साधना का परिणाम हूँ—धरती की करवटों, अग्नि की ज्वालाओं और जल की निरंतर रगड़ से आकार लिया है मैंने। जब पृथ्वी युवा थी, तब उसके भीतर की बेचैनी ने मुझे जन्म दिया। मैं उठा, उभरा, और धीरे-धीरे आकाश को छूने की चेष्टा करने लगा।

शुरुआत में मैं भी उग्र था—तेज, कठोर, अडिग। पर समय ने मुझे सिखाया कि ऊँचाई का अर्थ केवल ऊपर उठना नहीं, बल्कि नीचे की हर चीज़ को अपनाना भी है। मेरी गोद में नदियाँ जन्मीं, मेरे सीने पर जंगल उगे, और मेरी ढलानों पर जीवन ने अपने रंग बिखेरे।

लोग आते हैं मेरे पास—कुछ सुकून की तलाश में, कुछ जीत की चाह में। वे कहते हैं, “हमने पहाड़ जीत लिया।”

मैं मुस्कुरा देता हूँ…

क्योंकि मैं जानता हूँ—मुझे जीतना संभव नहीं, मुझे केवल महसूस किया जा सकता है।

मेरे सीने पर चलते हुए वे अपने भीतर के शोर से मिलते हैं।

मेरी चढ़ाई उन्हें थकाती है, पर वही थकान उन्हें उनके असली स्वरूप से परिचित कराती है।

मैं उन्हें सिखाता हूँ—हर ऊँचाई की कीमत होती है, और हर शिखर के बाद एक और शिखर प्रतीक्षा करता है।

मैंने ऋतुओं को बदलते देखा है—

सर्दियों में मैं सफ़ेद चादर ओढ़ लेता हूँ, जैसे कोई साधु मौन तपस्या में लीन हो।

गर्मियों में मेरी हरियाली खिल उठती है, जैसे जीवन का उत्सव मन रहा हो।

बरसात में मैं बादलों को अपने सीने से लगाता हूँ, और वे आँसुओं की तरह बरस पड़ते हैं।

मेरे भीतर भी दर्द है।

जब मेरे जंगल काटे जाते हैं, तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी साँसें छीन ली गई हों।

जब मेरे सीने को विस्फोटों से तोड़ा जाता है, तो मेरी चुप्पी चीख बन जाती है—पर कोई सुनता नहीं।

फिर भी मैं खड़ा हूँ—अडिग, शांत, सहनशील।

क्योंकि मेरा धर्म है टिके रहना, सहते रहना, और जीवन को थामे रखना।

मैंने इंसान को भी बदलते देखा है।

पहले वह मेरे पास श्रद्धा से आता था, अब स्वार्थ से आता है।

पहले वह मुझे माँ कहता था, अब संसाधन कहता है।

पर मैं अब भी वही हूँ

अपनी ऊँचाई में विनम्र, अपनी कठोरता में करुणामय।

कभी-कभी रात के सन्नाटे में, जब सब सो जाते हैं, मैं आकाश से बातें करता हूँ।

तारे मुझसे पूछते हैं

“क्या तुम थकते नहीं?”

मैं कहता हूँ—

“थकता हूँ… पर गिरता नहीं।”

क्योंकि मैं जानता हूँ—

मेरी स्थिरता ही दुनिया को संतुलन देती है।

मैं पहाड़ हूँ

समय का साक्षी,

प्रकृति का प्रहरी,

और मौन में छिपी अनंत कथाओं का अनकहा लेखक।

अगर कभी तुम सच में खुद को समझना चाहो,

तो मेरे पास आना…

मेरी चुप्पी में बैठना…

शायद तुम्हें तुम्हारी ही आवाज़ सुनाई दे जाए।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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