प्रौढ़ स्त्रियाँ अक्सर अपने कोमल एहसासों को छुपाकर रखती हैं…
प्रौढ़ स्त्रियाँ
अक्सर अपने कोमल एहसासों को
छुपाकर रखती हैं
जैसे पुराने संदूक में
कोई कीमती कपड़ा तह करके रखा जाता है,
कम इस्तेमाल,
ज़्यादा संभाल कर।
वे खुलकर नहीं रोतीं अब,
आँखों में आँसू आते भी हैं
तो पलकों के पीछे ही
सूख जाते हैं
जैसे बादल
बरसने से पहले ही
लौट जाएँ।
उनकी हँसी
अब शोर नहीं करती,
बस हल्की-सी
होठों पर आकर ठहर जाती है
जैसे किसी ने
दर्द को समझौते में बदल दिया हो।
कभी वो भी
गुब्बारों के पीछे भागी होंगी,
किसी नाम को
काग़ज़ पर बार-बार लिखा होगा,
किसी के इंतज़ार में
रातें जागी होंगी
मगर अब
वो सब यादें
चुपचाप
दिल के किसी कोने में
सिमट कर बैठ गई हैं।
प्रौढ़ स्त्रियाँ
अपने दुःख को
काम में बदल देती हैं
रसोई की आँच में,
पूजा की घंटियों में,
या किसी की चिंता में
ताकि
कोई पूछे भी तो
कह सकें
“सब ठीक है।”
उनके पास
कहानियाँ बहुत होती हैं,
पर सुनाने वाला
कोई नहीं होता।
और अगर कोई सुन भी ले,
तो वो कहती हैं
“अरे, कुछ खास नहीं…”
जैसे
अपने ही जीवन को
हल्का करके दिखाना
उनकी आदत बन गई हो।
प्रौढ़ स्त्रियाँ
प्यार भी करती हैं
पर जताती नहीं,
बस
किसी की थाली में
थोड़ा ज़्यादा परोस देती हैं,
या
चुपचाप
किसी के सिर पर हाथ फेर देती हैं।
उनके भीतर
एक नदी अब भी बहती है,
पर सतह पर
सब कुछ शांत दिखता है
जैसे
उन्होंने सीख लिया हो
कि गहराई को
दिखाना ज़रूरी नहीं होता।
प्रौढ़ स्त्रियाँ
अपने कोमल एहसासों को
छुपाकर रखती हैं
क्योंकि
उन्होंने जान लिया है
हर कोई
उन भावों की कीमत
समझ नहीं पाता।
और शायद
यही उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती है
कि वो टूटती भी हैं,
तो आवाज़ नहीं करतीं…
बस
थोड़ा और
मजबूत दिखने लगती हैं।
मुकेश ,,,,,,
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