डायरी: एकतरफ़ा प्रेम (जहाँ वो सिर्फ दोस्त समझती है)
दिन 1
आज उसने कहा—
“तुम बहुत अच्छे दोस्त हो…”
मैं मुस्कुराया।
और उसी मुस्कान में
थोड़ा-सा मर गया।
दिन 7
हम रोज़ बात करते हैं।
वो अपनी हर बात मुझसे शेयर करती है—
अपने दिन की, अपने दोस्तों की…
और
किसी “खास” की भी।
मैं सुनता हूँ।
जैसे कोई
खुद की कहानी
किसी और के लिए सुन रहा हो।
दिन 15
आज उसने पूछा—
“तुम्हें कोई पसंद है?”
मैंने कहा—
“नहीं…”
और पहली बार
झूठ बोलना इतना मुश्किल लगा।
दिन 25
वो जब हँसती है
तो लगता है
बस यही पल रुक जाए।
फिर याद आता है—
ये हँसी
मेरे लिए नहीं है।
दिन 40
उसने आज किसी लड़के का ज़िक्र किया—
“वो बहुत अच्छा है…”
मैंने कहा—
“हाँ, तुम्हारे लिए सही रहेगा…”
दिल ने कहा—
“तुम नहीं…”
दिन 55
अब मैं समझने लगा हूँ—
मैं उसकी ज़िंदगी में
एक “सुकून” हूँ,
“चाहत” नहीं।
दिन 70
आज उसने कहा—
“तुम्हारे जैसा दोस्त हर किसी को मिले…”
मैंने सोचा—
काश…
तुम्हें मेरे जैसा
दोस्त नहीं,
प्रेमी चाहिए होता।
दिन 85
मैंने दूरी बनाने की कोशिश की।
कम बात की।
उसने तुरंत पूछा—
“सब ठीक है? तुम बदल गए हो…”
मैं फिर पास आ गया।
क्योंकि
उसे खोने से बेहतर लगा
खुद को खो देना।
दिन 100
अब मैं
अपनी feelings को
नाम नहीं देता।
बस
उन्हें
छुपा लेता हूँ…
उसकी हर “thank you” में
एक अधूरा “I love you” दबा रहता है—
जो कभी बाहर नहीं आएगा।
दिन 130
आज उसने कहा—
“तुम मेरे सबसे खास दोस्त हो…”
मैंने फिर मुस्कुरा दिया।
अब
ये मुस्कान
आदत बन गई है।
दिन 160 — अंतिम पन्ना
शायद
एकतरफ़ा प्रेम का सबसे दर्दनाक हिस्सा
इंकार नहीं होता…
बल्कि
वो रिश्ता होता है
जो मिलता तो है
पर
कभी पूरा नहीं होता।
एकतरफ़ा प्रेम
जहाँ वो
तुम्हें दोस्त कहती है
और तुम
उस शब्द में
अपनी पूरी मोहब्बत
छुपा लेते हो…
मुकेश ,,,,,,
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